झालावाड़ स्कूल हादसा, प्रशासनिक लापरवाही की त्रासदी : विनय थानवी

विनय एक्सप्रेस समाचार, बीकानेर। संपादकीय आलेख, विनय थानवी।
25 जुलाई 2025 को राजस्थान के झालावाड़ जिले के मनोहरथाना क्षेत्र के पीपलोदी गांव में एक सरकारी स्कूल की छत गिरने से हुई त्रासदी ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। इस हादसे में सात मासूम बच्चों की जान चली गई, जबकि 27 से अधिक बच्चे घायल हुए। यह घटना न केवल एक दुखद हादसा है, बल्कि यह प्रशासनिक व्यवस्था की विफलता और लापरवाही का जीवंत प्रमाण है। यह हादसा हमें उन गहरे सवालों की ओर ले जाता है, जो सरकारी स्कूलों की जर्जर अवस्था, प्रशासनिक उदासीनता और बच्चों की सुरक्षा के प्रति गंभीरता की कमी को उजागर करते हैं।

हादसे का दर्दनाक परिदृश्य

पीपलोदी के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय में सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान अचानक छत ढह गई। इस समय स्कूल में करीब 60 बच्चे मौजूद थे, जिनमें से कई मलबे में दब गए। स्थानीय ग्रामीणों, पुलिस और प्रशासन की तत्परता से राहत और बचाव कार्य शुरू किया गया, लेकिन तब तक कई मासूम जिंदगियां असमय काल के गाल में समा चुकी थीं। एक छात्रा के बयान के अनुसार, छत से कंकड़ गिरने की शिकायत बच्चों ने शिक्षकों से की थी, लेकिन उनकी अनदेखी ने इस त्रासदी को और गंभीर बना दिया। यह हादसा केवल एक इमारत के ढहने की कहानी नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और जिम्मेदारी की कमी की दु:खद परिणति है।

प्रशासनिक व्यवस्था की नाकामी

यह हादसा तब हुआ, जब शिक्षा विभाग ने 14 जुलाई 2025 को ही सभी जिलों को मानसून से पहले स्कूल भवनों की जांच और मरम्मत के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद, झालावाड़ जिला प्रशासन ने इस आदेश को गंभीरता से नहीं लिया। स्थानीय लोगों के अनुसार, स्कूल की इमारत लंबे समय से जर्जर थी, और इसकी मरम्मत के लिए कई बार शिकायत की गई थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। यह स्पष्ट है कि जिला स्तर पर न तो स्कूल भवनों का नियमित निरीक्षण किया गया और न ही समय पर मरम्मत के लिए कदम उठाए गए। प्रदेश स्तर पर भी स्थिति चिंताजनक है। शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने स्वीकार किया कि राज्य में हजारों स्कूल भवन जर्जर हैं, और उनकी मरम्मत के लिए 200 करोड़ रुपये का प्रस्ताव तैयार किया गया है। लेकिन सवाल यह है कि जब शिक्षा विभाग और प्रशासन को पहले से ही जर्जर भवनों की जानकारी थी, तो समय पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई? यह लापरवाही केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं है; राजस्थान के कई ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों की स्थिति बदहाल है, और यह हादसा इस सच्चाई को उजागर करता है।

नेताओं की प्रतिक्रिया और जिम्मेदारी

हादसे के बाद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने शोक व्यक्त करते हुए घायल बच्चों के इलाज के लिए निर्देश दिए। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे ने भी इस घटना पर दु:ख जताया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी शोक व्यक्त किया और राहत कार्यों में सहयोग की अपील की। शिक्षा विभाग ने प्रारंभिक कार्रवाई के तहत स्कूल के पांच शिक्षकों को निलंबित किया है, लेकिन क्या यह कार्रवाई पर्याप्त है? यह हादसा केवल शिक्षकों की लापरवाही का परिणाम नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की विफलता का नतीजा है। जिम्मेदारी केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर डालकर उच्च अधिकारियों की जवाबदेही को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

शिक्षा व्यवस्था पर सवाल

झालावाड़ का यह हादसा राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाता है। एक ओर सरकार स्मार्ट शिक्षा को बढ़ावा देने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (UDISE+) के आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान में सरकारी स्कूलों में दाखिलों की संख्या में कमी आ रही है। 2021-22 में जहां 99.12 लाख बच्चों ने दाखिला लिया था, वहीं 2023-24 में यह संख्या घटकर 83.81 लाख रह गई। इसका कारण स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी और जर्जर भवनों जैसी आधारभूत समस्याएं हैं।

आगे की राह

इस त्रासदी से सबक लेते हुए सरकार को तत्काल कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, सभी सरकारी स्कूलों का सुरक्षा ऑडिट किया जाना चाहिए, और जर्जर भवनों की मरम्मत को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। दूसरा, स्कूलों में आपातकालीन निकास, फायर ड्रिल और प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। तीसरा, शिक्षकों और स्कूल स्टाफ को रेस्क्यू और प्राथमिक चिकित्सा की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। इसके साथ ही, प्रशासनिक जवाबदेही तय करने के लिए एक स्वतंत्र जांच समिति का गठन किया जाना चाहिए, जो इस हादसे के कारणों की गहराई से जांच करे और  को दंडित करे।

झालावाड़ का स्कूल हादसा एक चेतावनी है कि बच्चों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। यह घटना न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि यह भी बताती है कि सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने के लिए नीतिगत और व्यावहारिक स्तर पर गंभीर प्रयासों की जरूरत है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में ऐसी त्रासदी दोबारा न हो। मासूम बच्चों की जान की कीमत पर प्रशासनिक सुस्ती को और बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। यह समय केवल शोक व्यक्त करने का नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई करने का है, ताकि हर बच्चा स्कूल में सुरक्षित रह सके और शिक्षा का अधिकार सही मायने में साकार हो।