





विनय एक्सप्रेस आर्टिकल, विनय थानवी.आज डिजिटल युग में आम जनता हर घंटे लाखों पोस्ट, रील्स और वीडियो देख रही है। एक तरफ हैं सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, जिनके लाखों आभासी फॉलोअर्स हैं। दूसरी तरफ हैं डिजिटल मीडिया के पत्रकार, जो बिना दिखावे के सच्चाई की खोज में जुटे रहते हैं। राजस्थान सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा हाल में बीकानेर में इन्फ्लुएंसर्स को सरकारी योजनाओं का प्रचार सौंपने का फैसला इसी भ्रम को और गहरा कर रहा है।
आम जनता को अब गंभीरता से समझना चाहिए कि दोनों के बीच का अंतर कितना गहरा और महत्वपूर्ण है।
सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर : लोकप्रियता का बुलबुला, जिम्मेदारी शून्य
इन्फ्लुएंसर का पूरा खेल लोकप्रियता और कमाई पर टिका है। वे आकर्षक वीडियो, रील्स और कैप्शन बनाते हैं ताकि व्यूज बढ़ें, फॉलोअर्स बढ़ें और प्रायोजन मिले। यदि सरकार उन्हें प्रोत्साहन, पुरस्कार या सहयोग देती है, तो उनका कंटेंट स्वाभाविक रूप से सरकारी योजनाओं की तारीफ से भरा होगा। वे तथ्यों की जांच नहीं करते, स्रोतों की पुष्टि नहीं करते और न ही विपरीत दृष्टिकोण को जगह देते हैं।
उनकी कोई संपादकीय नीति नहीं, कोई आचार संहिता नहीं और न ही कोई जवाबदेही। आज वे एक योजना की प्रशंसा कर रहे हैं, कल किसी दूसरे प्रायोजक की। लाखों आभासी फॉलोअर्स की होड़ में वे कुछ भी कह सकते हैं, कुछ भी लिख सकते हैं। गलत जानकारी फैलाने पर उनके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं होती। वे महज एक बुलबुला हैं — चमकदार, आकर्षक, लेकिन हवा का एक झोंका लगते ही फूट जाता है।
डिजिटल पत्रकार: सत्य की खोज, पूरी जवाबदेही
दूसरी ओर डिजिटल मीडिया का पत्रकार पूरी तरह अलग मिशन पर काम करता है। वह सिर्फ सरकारी घोषणाएं नहीं लिखता, बल्कि योजनाओं की जमीनी हकीकत सामने लाता है — लाभ किस तक पहुंचा, कहां कमी रह गई, कहां भ्रष्टाचार हुआ। वह RTI, दस्तावेज, जमीनी सर्वे और कई स्रोतों से तथ्यों की पुष्टि करता है।
एक पत्रकार प्रेस काउंसिल की आचार संहिता, संपादकीय नीति और कानून के प्रति जवाबदेह होता है। गलत खबर पर उसकी जवाबदेही तय होती है। वह दिखावे या कमाई के लिए नहीं, बल्कि सूचना के अधिकार और जनहित के लिए अपना पूरा फोकस, समय और मेहनत लगाता है। उसका कंटेंट विश्वसनीय होता है क्योंकि वह सत्य पर टिका होता है, न कि व्यूज या लाइक्स पर।
सूचना एवं जनसंपर्क विभाग को समझना चाहिए :
विभागीय अधिकारियों को गंभीरता से सोचना चाहिए। जब उनके पास पहले से आधिकारिक वेबसाइट, फेसबुक, एक्स और इंस्टाग्राम पेज हैं, जब प्रेस रिलीज और प्रेस कॉन्फ्रेंस का पूरा तंत्र मौजूद है, तो इन्फ्लुएंसर्स को प्रचार का माध्यम बनाने की क्या जरूरत है?
इसके बजाय उन्हें डिजिटल युग से जुड़े उन सच्चे पत्रकारों पर विश्वास रखना चाहिए जो बिना किसी पुरस्कार, प्रोत्साहन या “प्रोजेक्ट” के रोजाना सच्चाई सामने लाते हैं। इन्फ्लुएंसर्स को प्रचारक बनाना लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की अवमूल्यन है।
आम जनता को समझना चाहिए:
अभाषी दुनिया से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण वह कंटेंट होता है जो पत्रकार लिखता है। क्योंकि वह उसमें अपना पूरा फोकस लगाता है — न कि दिखावे के लिए, न कमाई के लिए, न लाखों आभासी फॉलोअर्स की होड़ में। अयोग्य इन्फ्लुएंसर्स को बढ़ावा देने की बजाय हमें उन डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और पत्रकारों का साथ देना चाहिए जो बिना किसी दिखावे के सत्य की सेवा करते हैं।
सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर महज एक बुलबुला है — चमकता है, लेकिन टिकता नहीं।
डिजिटल पत्रकार विश्वसनीयता की नींव है — जो तूफान में भी खड़ा रहता है।
सरकार से अपील: इन्फ्लुएंसर्स की तुलना में डिजिटल पत्रकारों पर भरोसा रखें।
आम जनता से अपील: प्रचार को समाचार समझने की गलती न करें। व्यूज और लाइक्स से ज्यादा तथ्यों और जवाबदेही पर भरोसा करें।
क्योंकि सच्ची सूचना ही लोकतंत्र को मजबूत बनाती है।
विनय थानवी
मुख्य संपादक, विनय एक्सप्रेस मीडिया समूह
सचिव, एडिटर एसोसिएशन ऑफ न्यूज पोर्टल्स, बीकानेर













