राजस्थान में घूडला पूजा की एतिहासिक परम्परा : डॉ जगदीश नारायण ओझा

विनय एक्सप्रेस आलेख, डॉ. जगदीश नारायण ओझा।राव सातल देव (जोधपुर) और घुड़ले खान के मध्य संघर्ष की कहानी घुडला परम्परा से जुड़ी है 15वीं शताब्दी (लगभग 1492 ईस्वी) की है, जब जोधपुर पर राव सातल देव का शासन था। उस समय अजमेर के सूबेदार मल्लू खान का एक अत्यंत क्रूर सेनापति था, जिसका नाम घुड़ले खान था।
जिसने कन्याओं का अपहरण किया (चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन) पीपाड़ नामक स्थान पर मारवाड़ की लगभग 140 कुंवारी कन्याएँ गणगौर की पूजा के लिए एक तालाब के किनारे एकत्रित थीं। अवसर पाकर घुड़ले खान ने उन कन्याओं का अपहरण कर लिया और उन्हें अपने साथ ले जाने लगा। जब इसकी सूचना राजा राव सातल देव के पास पहुँची, तो उन्होंने बिना समय गंवाए अपनी सेना के साथ घुड़ले खान का पीछा किया। दोनों पक्षों में (कोसाणा का युद्ध) जोधपुर के पास कोसाणा नामक स्थान पर भीषण युद्ध हुआ। राव सातल देव ने अदम्य साहस दिखाते हुए घुड़ले खान को पराजित किया और युद्ध के मैदान में ही उसका सिर काट दिया। युद्ध में घुड़ले खान का सिर तीरों से पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो गया था। राव सातल देव वह कटा हुआ सिर लेकर मुक्त कराई गई कन्याओं को भेंट कर दिया तब से कन्याओं ने अपनी मुक्ति और घुड़ले खान की मृत्यु की खुशी में उस ‘छिद्रित सिर’ (घूडला) को पूरे शहर में घुमाया।
कालांतर में, उस कटे हुए सिर के प्रतीक स्वरूप मिट्टी के एक घड़े में कई छेद किए जाने लगे, जिसे ‘घुड़ला‘ कहा गया।

सांस्कृतिक महत्व और वर्तमान स्वरूप : राजस्थान में चैत्र कृष्ण अष्टमी से लेकर गणगौर तक यह पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। मारवाड़ की महिलाएँ सिर पर छिद्रित मिट्टी का घड़ा रखती हैं, जिसके भीतर एक जलता हुआ दीपक होता है। यह दीपक अंधकार पर प्रकाश की विजय और अन्याय पर न्याय की जीत का प्रतीक है। समय के साथ इस नृत्य मे थोड़ा बदलाव आया है और कही कही महिलाएं खाली कलश लेकर ही यह नृत्य करती है। साथ ही महिलाए प्रमुख गीत: -(मारो तेल बळे घी घाल घुडलो घूमेला) गीत के माध्यम से आज भी मारवाड़ की गलियों में राव सातल देव की वीरता की गूंज सुनाई देती है,इसके साथ ही
सामाजिक परंपरा
कुंवारी कन्याएं टोलियों में घर-घर जाकर ‘घुड़ला’ मांगती हैं। लोग श्रद्धा के साथ इन्हें धन,उपहार, तेल, अनाज भेंट करते हैं। उत्सव के अंतिम दिन, इस मटके को पवित्र जल में विसर्जित कर दिया जाता है। इस महान विजय की एक दुखद घटना यह भी थी कि युद्ध के दौरान राव सातल देव गंभीर रूप से घायल हो गए थे। कन्याओं को सुरक्षित उनके घर पहुँचने के कुछ ही समय बाद उनकी मृत्यु हो गई। इसीलिए, यह पर्व उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का भी एक माध्यम है।
घुड़ला पर्व मारवाड़ की रगों में दौड़ने वाले स्वाभिमान और वीरता का जीवंत प्रमाण है। यह हमें याद दिलाता है कि एक शासक का परम धर्म अपनी प्रजा और विशेषकर महिलाओं के सम्मान की रक्षा करना है