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विनय एक्सप्रेस आलेख, डॉ. जगदीश नारायण ओझा।राव सातल देव (जोधपुर) और घुड़ले खान के मध्य संघर्ष की कहानी घुडला परम्परा से जुड़ी है 15वीं शताब्दी (लगभग 1492 ईस्वी) की है, जब जोधपुर पर राव सातल देव का शासन था। उस समय अजमेर के सूबेदार मल्लू खान का एक अत्यंत क्रूर सेनापति था, जिसका नाम घुड़ले खान था।
जिसने कन्याओं का अपहरण किया (चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन) पीपाड़ नामक स्थान पर मारवाड़ की लगभग 140 कुंवारी कन्याएँ गणगौर की पूजा के लिए एक तालाब के किनारे एकत्रित थीं। अवसर पाकर घुड़ले खान ने उन कन्याओं का अपहरण कर लिया और उन्हें अपने साथ ले जाने लगा। जब इसकी सूचना राजा राव सातल देव के पास पहुँची, तो उन्होंने बिना समय गंवाए अपनी सेना के साथ घुड़ले खान का पीछा किया। दोनों पक्षों में (कोसाणा का युद्ध) जोधपुर के पास कोसाणा नामक स्थान पर भीषण युद्ध हुआ। राव सातल देव ने अदम्य साहस दिखाते हुए घुड़ले खान को पराजित किया और युद्ध के मैदान में ही उसका सिर काट दिया। युद्ध में घुड़ले खान का सिर तीरों से पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो गया था। राव सातल देव वह कटा हुआ सिर लेकर मुक्त कराई गई कन्याओं को भेंट कर दिया तब से कन्याओं ने अपनी मुक्ति और घुड़ले खान की मृत्यु की खुशी में उस ‘छिद्रित सिर’ (घूडला) को पूरे शहर में घुमाया।
कालांतर में, उस कटे हुए सिर के प्रतीक स्वरूप मिट्टी के एक घड़े में कई छेद किए जाने लगे, जिसे ‘घुड़ला‘ कहा गया।

सांस्कृतिक महत्व और वर्तमान स्वरूप : राजस्थान में चैत्र कृष्ण अष्टमी से लेकर गणगौर तक यह पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। मारवाड़ की महिलाएँ सिर पर छिद्रित मिट्टी का घड़ा रखती हैं, जिसके भीतर एक जलता हुआ दीपक होता है। यह दीपक अंधकार पर प्रकाश की विजय और अन्याय पर न्याय की जीत का प्रतीक है। समय के साथ इस नृत्य मे थोड़ा बदलाव आया है और कही कही महिलाएं खाली कलश लेकर ही यह नृत्य करती है। साथ ही महिलाए प्रमुख गीत: -(मारो तेल बळे घी घाल घुडलो घूमेला) गीत के माध्यम से आज भी मारवाड़ की गलियों में राव सातल देव की वीरता की गूंज सुनाई देती है,इसके साथ ही
सामाजिक परंपरा
कुंवारी कन्याएं टोलियों में घर-घर जाकर ‘घुड़ला’ मांगती हैं। लोग श्रद्धा के साथ इन्हें धन,उपहार, तेल, अनाज भेंट करते हैं। उत्सव के अंतिम दिन, इस मटके को पवित्र जल में विसर्जित कर दिया जाता है। इस महान विजय की एक दुखद घटना यह भी थी कि युद्ध के दौरान राव सातल देव गंभीर रूप से घायल हो गए थे। कन्याओं को सुरक्षित उनके घर पहुँचने के कुछ ही समय बाद उनकी मृत्यु हो गई। इसीलिए, यह पर्व उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का भी एक माध्यम है।
घुड़ला पर्व मारवाड़ की रगों में दौड़ने वाले स्वाभिमान और वीरता का जीवंत प्रमाण है। यह हमें याद दिलाता है कि एक शासक का परम धर्म अपनी प्रजा और विशेषकर महिलाओं के सम्मान की रक्षा करना है

इस आंदोलन मे 363 संतों और सदस्यों ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की, जिसमें महिलाएं और स्थानीय निवासी भी शामिल हैं। प्रोटेस्ट का केंद्र बीकानेर कलेक्ट्रेट के बाहर है, जहां स्वास्थ्य बिगड़ने की खबरों के बीच 537 लोग उपवास पर हैं।
आंदोलन को पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत सहित अनेक राजनितिक गैर राजनितिक संस्थाओ का समर्थन मिल रहा है.
राजस्थान सरकार ने आंदोलन के दबाव में खेजड़ी संरक्षण के लिए कदम उठाए हैं। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने विधानसभा में घोषणा की कि ट्री प्रोटेक्शन एक्ट लागू करने की प्रक्रिया चल रही है और जल्द ही बिल पेश किया जाएगा।
जोधपुर और बीकानेर डिवीजन में खेजड़ी कटाई पर प्रतिबंध लगाया गया है, साथ ही प्रोटेस्टर्स को लिखित आश्वासन देने की बात कही गई। हालांकि, पूरे राज्य में कटाई पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग बरकरार है, क्योंकि पिछले 15 वर्षों में 26 लाख से अधिक पेड़ कट चुके हैं। राज्य सरकार विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की बात कर रही है, लेकिन आंदोलनकारी इसे अपर्याप्त मानते हैं।

खेजड़ी का इतिहास राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा है। 1730 में खेजड़ली गांव (जोधपुर) में अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 बिश्नोई सदस्यों ने पेड़ों की रक्षा के लिए अपनी जान दी, जिसे चिपको आंदोलन का प्रेरणा स्रोत माना जाता है। 1983 में इसे राजस्थान का राज्य वृक्ष घोषित किया गया। बिश्नोई समाज के संस्थापक गुरु जांभोजी ने इसे पवित्र माना, और यह कृष्ण जन्माष्टमी पर पूजा जाता है।
उपयोगिता के मामले में खेजड़ी थार की ‘कल्पवृक्ष’ है। यह नाइट्रोजन फिक्सिंग से मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है, रेगिस्तान में फसल उत्पादन में सहायक। पत्तियां पशुओं के लिए चारा (प्रति पेड़ 60 किग्रा सालाना), संगरी (पॉड्स) राजस्थानी व्यंजनों में इस्तेमाल होती है और GI टैग की प्रक्रिया में है। लकड़ी ईंधन, उपकरण और आवास के लिए, जबकि छाया और पारिस्थितिकी सेवाएं स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करती हैं। यह रेगिस्तान में गरीबों के लिए भोजन, चारा और ईंधन का स्रोत है।
भविष्य में खेजड़ी को चुनौतियां हैं। मैकेनाइजेशन, सिंचाई और जलवायु परिवर्तन से इसकी संख्या घट रही है। सोलर प्रोजेक्ट्स से 50 लाख पेड़ों पर खतरा मंडरा रहा है, जो रेगिस्तानीकरण बढ़ा सकता है। संरक्षण कानून से बचाव संभव है, लेकिन सतत विकास मॉडल की जरूरत है। बिश्नोई समाज का आंदोलन याद दिलाता है कि पर्यावरण रक्षा सामूहिक जिम्मेदारी है। यदि कदम नहीं उठे, तो राजस्थान की पहचान खतरे में पड़ सकती है।
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India has taken significant steps to make medical information accessible to its doctors and researchers. The National Medical Library’s Electronic Resources in Medicine (NML-ERMED) Consortium is one such initiative. Started by the Ministry of Health and Family Welfare, it connects 70 government institutions, including all AIIMS campuses, with global medical journals.
The best part? These institutions do not pay a single rupee as membership fees—the government funds it. Today, 242 high-quality e-journals from top publishers like BMJ, Oxford, Cambridge, and Wiley are available through this network. Coordinated by the National Medical Library under the leadership of Prof. B. Srinivas, the consortium is expanding every year, bringing global knowledge to Indian doctors.
Similarly, Karnataka’s HELINET (Health Science Library & Information Network), launched by the Rajiv Gandhi University of Health Sciences, has been a game-changer for medical colleges across the state. Since 2002, it has offered e-books, e-journals, and databases, empowering thousands of students and faculty.
Another gem is medIND, a project by ICMR and NIC. It provides free access to Indian biomedical journals, case studies, and archives, giving Indian research much-needed visibility on the global stage.
At their core, medical databases are organized collections of health-related information. They serve different purposes:
Bibliographic Databases like PubMed and Embase provide access to millions of research articles.
Clinical Databases store patient records, helping doctors improve treatments and track outcomes.
Genetic Databases such as ClinVar connect genetic variations with diseases.
Public Health Databases like the UK Biobank collect large-scale data to study population health trends.
In short, these databases act as bridges between research, clinical practice, and public health.
Among all, PubMed stands tall as the world’s most popular medical database. Hosted by the U.S. National Institutes of Health, it houses over 35 million citations, making it the go-to resource for doctors and scientists worldwide. Its free counterpart, PubMed Central, provides more than 8 million full-text articles, ensuring knowledge is accessible to all.
Other well-known names include:
Embase: Famous for its strong coverage of drug research.
Cochrane Library: Trusted worldwide for its evidence-based reviews.
UpToDate: A clinical tool that keeps practitioners informed with constantly updated guidelines.
CINAHL Plus: Focused on nursing and allied health sciences.
Trip Database: A quick-access platform for evidence-based clinical research.
The journey of medical databases began much before the internet age. Back in 1879, the Index Medicus was launched as a printed index of medical literature. For more than a century, it was considered America’s greatest contribution to medical knowledge. With time, it evolved into MEDLINE and later merged with PubMed, setting the foundation for today’s digital medical libraries.
For patients, this might seem distant from everyday concerns. But the reality is different. When a doctor prescribes a new treatment, or a hospital adopts a modern procedure, chances are the information came from one of these databases. From pandemic response planning to genetic research, these resources silently shape healthcare decisions worldwide.
As medicine enters new frontiers like artificial intelligence and precision healthcare, the role of medical databases will only grow. They are no longer just libraries—they are lifelines. By ensuring equal access to information, initiatives like NML-ERMED, HELINET, and medIND are not only strengthening India’s healthcare system but also placing it firmly on the global map of medical knowledge.
In the words of many experts, knowledge saves lives. And in healthcare, medical databases are ensuring that knowledge travels faster than disease.
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इस आंदोलन ने सबसे पहले कार्यपालिका पर हमला किया। प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को इस्तीफ़ा देना पड़ा, और पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड के आवास पर भीड़ ने हमला किया। गृह और वित्त मंत्रियों सहित कई कैबिनेट सदस्यों को सुरक्षित ठिकानों की तलाश में भागना पड़ा, जिससे सरकार का केंद्र बिखर गया।
इसके बाद, लोकतंत्र के अन्य स्तंभ भी सुरक्षित नहीं रहे। संसद भवन और सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक इमारतों में आग लगा दी गई। नेपाल की प्रशासनिक धड़कन माने जाने वाले सिंग्हा दरबार को ध्वस्त कर दिया गया। यह केवल सरकारी इमारतों का विध्वंस नहीं था, बल्कि हर नेपाली नागरिक की पहचान, संपत्ति और अधिकारों पर सीधा हमला था, क्योंकि नागरिकता कार्यालय, भूमि रिकॉर्ड और सरकारी डेटा केंद्र भी जलाकर राख कर दिए गए।
व्यापार जगत भी इस हिंसा से अछूता नहीं रहा। होटल, डिपार्टमेंट स्टोर और ऑटोमोबाइल डीलरशिप को लूटा गया, जबकि बैंक और एटीएम तोड़ दिए गए। बड़े व्यवसायियों के घर भी निशाना बने। राजस्व विभाग और सीमा कस्टम चौकियों के नष्ट होने से सरकार के आय-स्रोत सूख गए।
सबसे खतरनाक बात यह थी कि सुरक्षा तंत्र पूरी तरह से ढह गया। जेलें तोड़कर अपराधियों को बाहर निकाला गया, सीमा चौकियाँ मिटा दी गईं, और पुलिस-सेना की प्रतिक्रिया नाकाफी रही। स्कूलों और कॉलेजों को जलाना, और छात्रों पर गोलियाँ चलाना यह दर्शाता है कि यह विद्रोह न केवल वर्तमान को बल्कि नेपाल के भविष्य को भी निगल रहा है।
नेपाल का राजनीतिक इतिहास आंदोलनों से भरा रहा है, जिनमें हर बार जनता सड़कों पर उतरी और सत्ता का चेहरा बदला:
* 1990 का जनआंदोलन (जनआंदोलन I): इसने निरंकुश राजशाही के खिलाफ बहुदलीय लोकतंत्र की बहाली की।
* 2006 का दूसरा जनआंदोलन (जनआंदोलन II): इसने राजा ज्ञानेंद्र की सत्ता समाप्त कर लोकतांत्रिक गणराज्य का मार्ग प्रशस्त किया।
* 2015 का संविधान आंदोलन: नए संविधान के विरोध में हुआ, जिसने मधेसी आंदोलन को जन्म दिया और नेपाल की स्थिरता पर प्रश्नचिह्न लगाया।
हालांकि हर आंदोलन के बाद, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, असमानता और कमजोर शासन की निराशा वापस लौट आई। आज का आंदोलन उसी ऐतिहासिक असंतोष का नवीनतम रूप है, लेकिन इसमें डिजिटल युग का गुस्सा और वैश्विक भू-राजनीतिक ताकतों का प्रभाव अधिक गहरा है।
नेपाल की इस अराजकता को केवल आंतरिक असंतोष मान लेना एक भूल होगी। इस आंदोलन में विदेशी फंडिंग, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर संगठित प्रचार और पड़ोसी देशों की दिलचस्पी के संकेत मिलते हैं। ये सभी कारक उस परदे के पीछे की ताकतों की ओर इशारा करते हैं जो दक्षिण एशिया में अस्थिरता फैलाकर भारत को घेरना चाहती हैं।
भारत पर इसका सीधा असर पड़ना तय है। खुली सीमा से शरणार्थियों के दबाव के साथ-साथ अवैध हथियारों और मादक पदार्थों की तस्करी बढ़ सकती है। नेपाल की कमजोर होती संस्थाएं चीन और पाकिस्तान के लिए अवसर बन सकती हैं, जो भारत की उत्तरी सीमाओं को असुरक्षित कर सकते हैं। यह एक हाइब्रिड वॉरफेयर (Hybrid Warfare) की रणनीति है, जहाँ आंतरिक असंतोष को हथियार बनाकर पड़ोसी देशों के लिए अराजकता का अड्डा तैयार किया जाता है।

यह सच है कि नेपाल के युवाओं के सवाल वास्तविक हैं। वे बेहतर शिक्षा, रोजगार और पारदर्शी शासन चाहते हैं। लेकिन नेपाल की जनता और नेतृत्व को यह समझना होगा कि उनकी असहमति को बाहरी ताकतें अपने हित में इस्तेमाल कर रही हैं।
भारत के लिए यह समय सतर्क रहने का है। नेपाल की आग को केवल “उनकी समस्या” कहकर नजरअंदाज करना भारी भूल होगी। यह संकट भारत की उत्तरी सीमा की स्थिरता और सुरक्षा से सीधे जुड़ा है। अगर नेपाल का यह विद्रोह नियंत्रित नहीं हुआ, तो यह पूरे दक्षिण एशिया को अस्थिर करने वाली एक सुनियोजित साजिश बन सकता है।
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At the helm of Rajasthan’s Finance Department, Jain has focused on strengthening the state’s fiscal management. His emphasis on transparency and efficient resource allocation has helped streamline government programs and ensure delivery at the grassroots level. Colleagues say his ability to simplify complex policies has improved implementation and boosted public trust.

Perhaps Jain’s most widely recognized initiative is Sparsh Abhiyan, launched in 2018 to teach children the difference between good touch and bad touch. What began with just five children has grown into a campaign that has reached more than half a million across 21 districts and 2,000 schools. Relying on 600 volunteers and no government funding, the program spreads the simple but powerful message of “No, Go & Tell,” encouraging children to speak up against abuse.

The campaign’s impact has been visible: in Tonk, Jaipur, Sri Ganganagar, and beyond, sessions led by doctors and volunteers have helped children identify unsafe situations, while also raising awareness about risks posed by social media. Over time, Sparsh Abhiyan has evolved into a grassroots movement, reshaping how communities talk about child safety.

As Mission Director of the National Health Mission, Jain led aggressive measures to combat illegal sex determination practices. Rajasthan’s child sex ratio stood at 888 (ages 0–6) in the 2011 Census, well below the national average of 914. Jain oversaw hundreds of decoy operations, shutting down illegal clinics and prosecuting offenders under the PCPNDT Act. By 2019, the ratio had crossed 900—a statistical and social breakthrough for the state.

Jain’s tenure in the Education Department was marked by speed and scale. Teacher recruitment drives were completed in record time, easing shortages and improving the teacher-student ratio. Dropout rates fell, especially among girls, as new programs expanded access to education. His promotion of digital learning—from smart classrooms to online platforms—helped rural districts see dramatic improvements in board exam results.
In charge of Rajasthan Roadways, Jain emphasized efficiency and passenger convenience. Digital ticketing, online booking, and punctuality drives transformed the state-run transport system. He also pushed for eco-friendly buses and better connectivity in rural areas, balancing modernization with accessibility.

Beyond government work, Jain has consistently partnered with civic groups and volunteers to push social awareness campaigns. His leadership style—equal parts empathetic and innovative—has earned him recognition not just as an administrator, but as a reformer with a human touch.

The numbers tell part of the story: a child safety campaign reaching 500,000 children, a sex ratio that finally nudged upward, record-setting teacher recruitment, and modernized roadways. But colleagues point to something deeper: Jain’s belief that governance is not about wielding authority but about solving problems and serving people. In a system often criticized for inertia, Naveen Jain stands out as proof that committed leadership can spark both institutional reform and social change.
]]>पंडित राजेंद्र व्यास, जिन्हें प्यार से मम्मू महाराज कहा जाता है, का जन्म बीकानेर में एक विद्वान परिवार में हुआ। बचपन से ही उनकी रुचि ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन में थी। उन्होंने संस्कृत, वेद और ज्योतिष शास्त्र में गहन अध्ययन किया और इस क्षेत्र में अपनी विशेषज्ञता को निखारा। उनकी शिक्षा और ज्ञान का आधार पारंपरिक भारतीय ज्योतिष के साथ-साथ आधुनिक दृष्टिकोण का संगम है, जिसके कारण उनकी भविष्यवाणियाँ और सलाह न केवल सटीक होती हैं, बल्कि व्यवहारिक भी होती हैं।
मम्मू महाराज ने ज्योतिष के क्षेत्र में अपनी सटीक गणनाओं और भविष्यवाणियों के लिए व्यापक ख्याति अर्जित की है। वे कुंडली विश्लेषण, ग्रह-नक्षत्रों के प्रभाव, और वास्तु शास्त्र के आधार पर लोगों को मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। उनकी विशेषता यह है कि वे जटिल ज्योतिषीय गणनाओं को सरल भाषा में समझाने में सक्षम हैं, जिससे आम लोग भी उनकी सलाह को आसानी से समझ सकते हैं। उनके द्वारा दी गई भविष्यवाणियाँ और उपाय न केवल व्यक्तिगत जीवन जैसे विवाह, करियर, और स्वास्थ्य से संबंधित हैं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर भी उनकी गहरी अंतर्दृष्टि रही है। मम्मू महाराज ने कई बार सामाजिक समस्याओं और प्राकृतिक घटनाओं के बारे में पहले से ही सटीक भविष्यवाणियाँ की हैं, जिसने उनकी विश्वसनीयता को और बढ़ाया है।
मम्मू महाराज को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए कई सम्मान प्राप्त हुए हैं। मध्य प्रदेश के रतलाम में आयोजित अखिल भारतीय पंचांग ज्योतिष वास्तु महाकुंभ में उन्हें ज्योतिष शिरोमणि पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार उनकी विद्वता और ज्योतिष के प्रति समर्पण का प्रतीक है। इसके अलावा, बीकानेर में आयोजित विभिन्न ज्योतिष संगोष्ठियों और महासम्मेलनों में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही है, जहाँ उन्होंने अपने ज्ञान को साझा किया और नवोदित ज्योतिषियों को प्रेरित किया।
मम्मू महाराज केवल एक ज्योतिषी ही नहीं, बल्कि एक समाजसेवी भी हैं। उन्होंने गणेश चतुर्थी जैसे धार्मिक अवसरों पर भक्तों को भगवान गणेश की पूजा-अर्चना और साधना के महत्व के बारे में जागरूक किया है। इसके अलावा, वे ज्योतिष शोध संस्थानों और संगोष्ठियों के माध्यम से ज्योतिष के प्रचार-प्रसार और शिक्षा में योगदान दे रहे हैं। बीकानेर में 26 जून 2022 को आयोजित ज्योतिष महासम्मेलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिसने ज्योतिष के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित किए।
मम्मू महाराज का प्रभाव केवल बीकानेर तक सीमित नहीं है। उनकी ख्याति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रख्यात सिने अभिनेता मनोज वाजपेयी ने एक साक्षात्कार में उनकी तारीफ की और उनके ज्योतिषीय ज्ञान की सराहना की। यह उनकी लोकप्रियता और विश्वसनीयता का एक उदाहरण है। लोग उनके पास न केवल व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान के लिए आते हैं, बल्कि उनके आध्यात्मिक और धार्मिक मार्गदर्शन के लिए भी उन पर भरोसा करते हैं।
ज्योतिष आचार्य मम्मू महाराज बीकानेर के गौरव हैं, जिन्होंने अपनी विद्वता, सटीक भविष्यवाणियों और समाज के प्रति समर्पण के माध्यम से एक विशेष स्थान बनाया है। उनका जीवन और कार्य न केवल ज्योतिष के क्षेत्र में एक मिसाल है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि परंपरा और आधुनिकता का समन्वय कैसे समाज के लिए लाभकारी हो सकता है। मम्मू महाराज का योगदान बीकानेर की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर को और समृद्ध करता है।
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लोकल फॉर वोकल’ का मतलब है अपने स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देना और उनके प्रति गर्व का भाव रखना। भारत में छोटे और मध्यम उद्यम (MSME) देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। ये उद्यम न केवल ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में रोजगार सृजन करते हैं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और पारंपरिक कला को भी जीवित रखते हैं। खादी, हस्तशिल्प, मसाले, हर्बल उत्पाद, और स्थानीय खाद्य पदार्थ जैसे उत्पाद हमारी पहचान हैं। इनका समर्थन करके हम न केवल अपने देश के कारीगरों और उद्यमियों को प्रोत्साहित करते हैं, बल्कि आयात पर निर्भरता को भी कम करते हैं।

लोकल फॉर वोकल’ अभियान आत्मनिर्भर भारत की नींव है। जब हम स्थानीय उत्पाद खरीदते हैं, तो हमारा पैसा हमारे ही देश में रहता है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। यह अभियान हमें यह भी सिखाता है कि हमें अपने उत्पादों की गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए ताकि वे वैश्विक बाजार में भी प्रतिस्पर्धा कर सकें। भारतीय उद्योग व्यापार मंडल, दिल्ली प्रदेश इस दिशा में निरंतर प्रयासरत है। हम व्यापारियों और उद्यमियों को प्रोत्साहित करते हैं कि वे अपने उत्पादों की गुणवत्ता और ब्रांडिंग पर ध्यान दें ताकि ‘मेड इन इंडिया’ की पहचान विश्व स्तर पर और मजबूत हो।

दिल्ली, भारत की राजधानी होने के साथ-साथ एक व्यापारिक केंद्र भी है। यहां के बाजारों में स्थानीय और स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए भारतीय उद्योग व्यापार मंडल कई पहल कर रहा है। हम व्यापारियों को जागरूक कर रहे हैं कि वे अपने व्यवसाय में स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता दें। इसके लिए हमने कई कार्यशालाएं और जागरूकता अभियान चलाए हैं, जिनमें छोटे उद्यमियों को डिजिटल मार्केटिंग, ब्रांडिंग और गुणवत्ता नियंत्रण जैसे विषयों पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
हाल ही में दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित 43वें भारतीय अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में भी ‘लोकल फॉर वोकल’ की थीम को प्रमुखता दी गई। इस मेले में स्थानीय कारीगरों और उद्यमियों ने अपने उत्पादों को प्रदर्शित किया, जिसे देश-विदेश के लोगों ने सराहा। यह एक उदाहरण है कि कैसे हम अपने स्थानीय उत्पादों को वैश्विक मंच पर ले जा सकते हैं।

लोकल फॉर वोकल को अपनाने में कुछ चुनौतियां भी हैं। कई बार उपभोक्ता विदेशी ब्रांड्स की ओर आकर्षित होते हैं, क्योंकि स्थानीय उत्पादों की मार्केटिंग और पैकेजिंग में कमी रहती है। इसके लिए हमें अपने उत्पादों की गुणवत्ता, डिजाइन और प्रचार को बेहतर करना होगा। साथ ही, सरकार द्वारा प्रदान की जा रही योजनाओं जैसे स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया का लाभ उठाकर छोटे उद्यमियों को सशक्त करना होगा। भारतीय उद्योग व्यापार मंडल, दिल्ली प्रदेश इस दिशा में सरकार और व्यापारियों के बीच एक सेतु का काम कर रहा है। हम व्यापारियों की समस्याओं को सरकार तक पहुंचाते हैं और उनकी नीतियों को लागू करने में सहयोग करते हैं। साथ ही, हम उपभोक्ताओं से अपील करते हैं कि वे खरीदारी करते समय स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता दें।

नवीन गर्ग के अनुसार लोकल फॉर वोकल’ केवल एक अभियान नहीं, बल्कि एक जीवनशैली है। यह हमें आत्मनिर्भरता, स्वावलंबन और अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश देता है। भारतीय उद्योग व्यापार मंडल, दिल्ली प्रदेश इस अभियान को जन-जन तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारा लक्ष्य है कि दिल्ली के हर बाजार में स्वदेशी उत्पादों की चमक दिखे और हर व्यापारी इस अभियान का हिस्सा बने। आइए, हम सब मिलकर ‘लोकल फॉर वोकल’ को एक जन-आंदोलन बनाएं। अपने स्थानीय उत्पादों को अपनाएं, अपने कारीगरों और उद्यमियों को प्रोत्साहित करें और आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करें। क्योंकि जब हम अपने लोकल के लिए वोकल होंगे, तभी हमारा भारत विश्व गुरु बनेगा।

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रमल ज्योतिष को अक्सर अरब-फारसी पद्धति माना जाता है, परंतु वास्तव में यह सनातन संस्कृति की जड़ों से जुड़ी है। यह विद्या शिव-पार्वती के पाशों (पासों) के माध्यम से भविष्यवाणी की परंपरा से प्रेरित है और साधना पर आधारित है। बीकानेर के विख्यात रमलाचार्य नितेश व्यास, जो डेढ़ दशक से ज्योतिष का अध्ययन कर रहे हैं, बताते हैं कि रमल ज्योतिष में सोलह भावों का वर्णन है। इनमें अंतिम भाव को ‘साक्षी घर’ कहा जाता है।
इस विद्या में प्रथम शक्ल ‘लह्यान’ होती है, जो गुरु ग्रह से संबंधित है। शुभ मुहूर्त में पासे फेंककर सोलह भावों की गणना की जाती है, जिसके आधार पर प्रश्नकर्ता के प्रश्नों का उत्तर और समय का निर्णय किया जाता है।रमल ज्योतिष में रमल बावनी, बत्तीसी, गुलजार, रमल शलाका, और रमल कार्ड जैसी विधियाँ शामिल हैं। रमलाचार्य नितेश व्यास इनका उपयोग जनकल्याण के लिए कर रहे हैं। यह विद्या दिन के डेढ़ प्रहर तक और विशेष तिथियों पर प्रयोग की जाती है। रमल ज्योतिष की विशेषता यह है कि यह बिना प्रश्न पूछे ही प्रश्नकर्ता के मन की बात का जवाब दे सकती है। इसमें किसी फल, वस्तु या नाम के आधार पर गणना की जाती है।

रमलाचार्य नितेश व्यास ने बीकानेर में अनेक ज्योतिषियों को रमल कार्ड पद्धति का प्रशिक्षण दिया है और निरंतर यह कार्य कर रहे हैं। वर्तमान में वे रमल ज्योतिष की आठ से नौ विधियों पर कार्य कर रहे हैं और इस विषय पर पुस्तक भी लिख रहे हैं। उनकी यह साधना और समर्पण रमल ज्योतिष को पुनर्जनन प्रदान कर रहा है।
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टैरिफ का असर और उसकी पृष्ठभूमि:
अमेरिका द्वारा लगाए गए 25% टैरिफ का उद्देश्य भारतीय उत्पादों को अमेरिकी बाजार में महंगा बनाकर वहां की घरेलू कंपनियों को बढ़ावा देना है। हालांकि यह अमेरिका की “प्रोटेक्शनिस्ट नीति” का हिस्सा है, लेकिन इससे भारत के निर्यात, विशेष रूप से स्टील, एल्यूमिनियम, टेक्सटाइल, आईटी और ऑटोमोबाइल क्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
इस कदम से भारत में व्यापार, रोज़गार और विदेशी निवेश जैसे क्षेत्रों में चिंता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ऐसे में सरकार की भूमिका के साथ-साथ नागरिकों की सक्रिय भूमिका और जिम्मेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
नागरिकों की भूमिका:
लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्येक नागरिक केवल मतदाता ही नहीं होता, बल्कि वह एक सजग प्रहरी भी होता है। जब कोई बाह्य संकट उत्पन्न होता है, तो नागरिकों को निम्नलिखित रूपों में राष्ट्रहित में योगदान देना चाहिए
घरेलू उत्पादों का समर्थन:
विदेशी टैरिफ का प्रभाव कम करने के लिए ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘मेड इन इंडिया’ जैसे अभियानों को समर्थन देकर देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूती दी जा सकती है।
लोकतांत्रिक दबाव:
नागरिकों को अपने जनप्रतिनिधियों से यह अपेक्षा करनी चाहिए कि वे ऐसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर सरकार को उचित नीति बनाने हेतु प्रेरित करें।
सोशल मीडिया, लेखन, संवाद और बहस के ज़रिए लोग जनमत तैयार कर सकते हैं जो सरकार को नीति निर्माण में दिशा दे सकता है।
शांति और सहिष्णुता बनाए रखना:
बाहरी दबाव के समय आंतरिक एकता अत्यंत आवश्यक होती है। किसी भी प्रकार की अफवाह या भावनात्मक उकसावे से बचते हुए राष्ट्रहित में एकजुट रहना नागरिक धर्म है।
लोकतंत्र में प्रजा की भूमिका का महत्व:
लोकतंत्र का मूल स्तंभ है – “जनता की सरकार, जनता द्वारा और जनता के लिए”। इसका सीधा अर्थ यह है कि देश की नीतियाँ जनता की इच्छाओं और ज़रूरतों के आधार पर तय होती हैं। जब नागरिक सक्रिय और जागरूक होते हैं, तो सरकार भी उत्तरदायी और पारदर्शी रहती है।
इस संदर्भ में जब कोई अंतरराष्ट्रीय संकट सामने आता है, जैसे कि व्यापारिक टैरिफ, तो यह जरूरी हो जाता है कि प्रजा अपने विचारों, सवालों और सहयोग के माध्यम से नीतियों को संतुलित और राष्ट्रीय हित में बनाए रखे।
अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा लगाए गए टैरिफ भारत के लिए एक चुनौती है, लेकिन यह संकट एक अवसर भी है — अपनी आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने का। लोकतंत्र में नागरिकों की भूमिका केवल चुनाव तक सीमित नहीं होती, बल्कि हर राष्ट्रीय संकट में वे महत्वपूर्ण भागीदारी निभाते हैं।
आज भारत को ऐसे ही जागरूक, सहिष्णु और उत्तरदायी नागरिकों की ज़रूरत है जो न केवल सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हों, बल्कि वैश्विक मंच पर भी भारत की गरिमा बनाए रखें।
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गहलोत के बीकानेर रेलवे स्टेशन पहुंचने पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उनका भव्य स्वागत किया, जिसमें पूर्व मंत्री डॉ.बी.डी. कल्ला, गोविंद राम मेघवाल, भंवर सिंह भाटी, अशोक गहलोत फैन्स क्लब के प्रदेशाध्यक्ष ऋषि व्यास, आनंद जोशी एवं नितिन वत्स सहित अन्य नेताओं ने हिस्सा लिया। यह स्वागत दर्शाता है कि गहलोत का बीकानेर में मजबूत जनाधार और कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रियता बरकरार है।
संगठनात्मक रणनीति: गहलोत ने इस दौरे में कार्यकर्ताओं से मुलाकात की और संविधान बचाओ रैली जैसे आयोजनों में हिस्सा लिया। यह कांग्रेस की संगठनात्मक ताकत को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं में जोश भरने का प्रयास था। रविन्द्र रंगमंच पर आयोजित संविधान सभा में भारी संख्या में कार्यकर्ताओं की मौजूदगी इसका प्रमाण है।
गहलोत ने बीकानेर दौरे के दौरान केंद्र की मोदी सरकार और गृह मंत्री अमित शाह पर तीखा हमला बोला। उन्होंने 26 लोगों की मौत का मुद्दा उठाते हुए जवाबदेही की कमी पर सवाल खड़े किए।
मायने: यह बयानबाजी गहलोत की रणनीति का हिस्सा थी, जिसमें उन्होंने कांग्रेस के राष्ट्रीय मुद्दों को स्थानीय स्तर पर उठाकर बीजेपी को घेरने की कोशिश की। यह दर्शाता है कि गहलोत न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी विपक्ष की आवाज को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
गहलोत ने धरणीधर ऑडिटोरियम में प्रो. अशोक आचार्य की स्मृति में आयोजित व्याख्यानमाला में हिस्सा लिया, जहां “महात्मा गांधी का जीवन दर्शन संविधान के परिपेक्ष्य में” विषय पर चर्चा हुई। उन्होंने धर्म और जाति के आधार पर देश के हालात पर चिंता जताई और संविधान के मूल्यों को बचाने की आवश्यकता पर बल दिया।
राजनीतिक संदेश: यह आयोजन गहलोत की उस छवि को मजबूत करता है, जिसमें वे गांधीवादी विचारधारा और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को रेखांकित करते हैं। यह कांग्रेस की वैचारिक स्थिति को पुनर्जनन करने और युवा मतदाताओं को आकर्षित करने का प्रयास भी हो सकता है।
गहलोत का बीकानेर से पुराना नाता रहा है। उन्होंने अपने पुराने अनुभव साझा करते हुए बीकानेर के ठेलों पर रात बिताने और NSUI के कार्यक्रमों का जिक्र किया, जो उनकी इस क्षेत्र से गहरी सियासी जड़ों को दर्शाता है।
स्थानीय नेताओं का समर्थन: बीकानेर में गहलोत खेमे के नेताओं जैसे डॉ.बी.डी. कल्ला, गोविंद मेघवाल और भंवर सिंह भाटी का मजबूत समर्थन दर्शाता है कि यह क्षेत्र उनकी सियासी ताकत का एक महत्वपूर्ण केंद्र है।
मायने: बीकानेर में गहलोत की सक्रियता यह संकेत देती है कि वे राजस्थान में अपनी सियासी प्रासंगिकता को बनाए रखने और स्थानीय नेताओं को एकजुट रखने की कोशिश कर रहे हैं, खासकर तब जब कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें चल रही हैं।
गहलोत का यह दौरा बीकानेर में इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह क्षेत्र सचिन पायलट के प्रभाव से अपेक्षाकृत मुक्त माना जाता है। गहलोत ने इस दौरे का इस्तेमाल अपने समर्थकों को मजबूत करने और पार्टी के भीतर अपनी स्थिति को और सुदृढ़ करने के लिए किया।
मायने: यह दौरा कांग्रेस के भीतर गहलोत की स्थिति को मजबूत करने का संकेत देता है, खासकर तब जब पार्टी में सचिन पायलट और अन्य नेताओं के बीच नेतृत्व को लेकर चर्चाएं चल रही हैं। गहलोत का यह कदम यह दर्शाता है कि वे अभी भी राजस्थान कांग्रेस की धुरी बने हुए हैं।
गहलोत का दौरा आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। बीकानेर संभाग में उनकी सक्रियता यह संकेत देती है कि वे कांग्रेस को ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
मायने: यह दौरा न केवल कार्यकर्ताओं को प्रेरित करने बल्कि स्थानीय मुद्दों को उठाकर बीजेपी सरकार की कमियों को उजागर करने का प्रयास था। गहलोत ने बीजेपी पर जवाबदेही की कमी का आरोप लगाकर मतदाताओं के बीच असंतोष को भुनाने की कोशिश की।
अशोक गहलोत का बीकानेर दौरा उनके सियासी कौशल और रणनीति का एक और उदाहरण है। यह दौरा न केवल उनके व्यक्तिगत प्रभाव को दर्शाता है, बल्कि कांग्रेस की संगठनात्मक ताकत को मजबूत करने और बीजेपी को राष्ट्रीय और स्थानीय मुद्दों पर घेरने की रणनीति को भी रेखांकित करता है। गहलोत ने इस दौरे के माध्यम से यह संदेश देने की कोशिश की कि वे राजस्थान में कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे बने रहेंगे और पार्टी के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिकार हैं। साथ ही, यह दौरा उनके समर्थकों को एकजुट रखने और पार्टी के भीतर अपनी स्थिति को और मजबूत करने का प्रयास था।
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