js_composer domain was triggered too early. This is usually an indicator for some code in the plugin or theme running too early. Translations should be loaded at the init action or later. Please see Debugging in WordPress for more information. (This message was added in version 6.7.0.) in /home2/vokunju1/public_html/vinayexpress.in/wp-includes/functions.php on line 6170झालावाड़ का स्कूल हादसा एक चेतावनी है कि बच्चों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। यह घटना न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि यह भी बताती है कि सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने के लिए नीतिगत और व्यावहारिक स्तर पर गंभीर प्रयासों की जरूरत है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में ऐसी त्रासदी दोबारा न हो। मासूम बच्चों की जान की कीमत पर प्रशासनिक सुस्ती को और बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। यह समय केवल शोक व्यक्त करने का नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई करने का है, ताकि हर बच्चा स्कूल में सुरक्षित रह सके और शिक्षा का अधिकार सही मायने में साकार हो।
विधानसभा में जिस प्रकार सदस्यों का आचरण हो चला है वह सबसे बड़ा सिरदर्द सदन के अध्यक्ष के लिए होता है। यह अध्यक्ष का दायित्व होता है कि सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से नियमानुसार चले। जब कोई सदस्य या बहुत से सदस्य इस प्रकार व्यवहार करने लगें जिससे सदन की कार्यवाही बाधित हो उठे तब अध्यक्ष को कड़ा रुख अपनाना पड़ता है और बाधा डाल रहे सदस्य या सदस्यों पर अनेक बार कार्यवाही करनी भी लाज़मी हो जाती है। विधानसभा के अध्यक्ष का पद गरिमा का होता है। अध्यक्ष पर उस सदन को चलाने की जिम्मेवारी होती है जहां लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए लोकतान्त्रिक तरीके से विमर्श करने के वास्ते राज्य के नागरिकों के निर्वाचित प्रतिनिधि बैठते हैं। विधानसभा के नियम सदन स्वयं बनाता है। ये नियम परंपराओं से भी बनते हैं। पिछले काल में सदन ने किस प्रकार कोई निर्णय लिया या किसी अध्यक्ष ने क्या निर्णय दिया ये सब परंपरा का हिस्सा होते हैं। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि “संसदीय लोकतंत्र में अध्यक्ष सदन की गरिमा और स्वतंत्रता का प्रतिनिधित्व करता है, और क्योंकि सदन देश का प्रतिनिधित्व करता है इसलिए स्पीकर एक तरह से देश की स्वतंत्रता और स्वतंत्रता का प्रतीक बन जाता है।” जो बात नेहरू ने लोकसभा अध्यक्ष के लिए कही वही बात राज्य विधानसभा के अध्यक्ष पर भी लागू होती है। पिछले दिनों राज्य विधान सभा में कांग्रेस को समर्थन दे रहे एक निर्दलीय विधायक जिन्हें मुख्यमंत्री का सलाहकार बनाया हुआ है के आचरण और उस पर विधानसभा अध्यक्ष द्वारा “थ्रो हिम आउट” (उन्हें बाहर फेंक दो) कहते हुए सदन से बाहर निकालने का मर्शाल को आदेश देने की घटना हमें बदलते लोकतान्त्रिक व्यवहारों के संकेत देती है। राज्य विधान सभा में जो कुछ हुआ उससे आमजन में निर्वाचित सदन की छवि को धक्का ही लगा है। क्योंकि अध्यक्ष का काम सदन में व्यवस्था और मर्यादा बनाए रखने का होता है इसलिए उसका अपना व्यवहार ऐसा गरिमामय होने की अपेक्षा स्वभावतः होती है जिसे देख कर सदन के सदस्य उनका अनुसरण करें। सदन में कितना भी तनाव हो जाए और उत्तेजित सदस्य आपे से बाहर होकर मर्यादाएं भूल जाएं तब भी खुद बिना उत्तेजित हुए शांत बने रह कर सदन का संचालन करने की जिम्मेवारी अध्यक्ष पर आ जाती है। एक प्रकार से उसे सदन का सबसे धीरज वाला सदस्य होने का परिचय देना होता है। अनेक बार ऐसे मौके आ जाते हैं जब उसका धीरज जवाब देने के हालात बन जाते हैं। ऐसे में ही सदन के अध्यक्ष के आसन पर बैठे व्यक्ति की परीक्षा होती है। ऐसा नहीं है कि राज्य विधान सभा के पिछले 14 कार्यकालों में बड़े हंगामे नहीं हुए हों। विभिन्न काल के अध्यक्षों ने जब भी सदन में व्यवस्था बिगड़ी और कार्यवाही में बाधा पड़ी तब कडा रुख अपनाया मगर कभी किसी अध्यक्ष ने अपना धीरज नहीं खोया। कभी गुस्से का इजहार नहीं किया। कह सकते हैं कि राजस्थान विधानसभा के इतिहास में किसी भी अध्यक्ष ने किसी भी उत्तेजना के माहौल में कभी “रिंग मास्टर” जैसी भूमिका नहीं निभाई। राज्य विधान सभा के अध्यक्ष रहे पूनमचंद विश्नोई ने एक बार किसी मुद्दे पर सदन में कहा था कि “अध्यक्ष को स्पीकर कहा जाता है, किन्तु उसका काम सबसे कम बोलना होता है।” वे यह भी मानते थे कि अनेक बार सदस्य “सदन के कार्य संचालन नियमों से बाहर जाकर तुरंत अपनी बात कहने की अधीरता दिखाते हैं।” चतुर अध्यक्ष सबको थोड़ी ढील देते हुए सामंजस्य बनाए रख कर सदन को सुचारु रूप से चला लेता है। यह भी सच है कि सदन को सुचारु रूप से चलाने की जिम्मेवारी बहुमत वाले हां पक्ष की होती है। इस घटनाक्रम में एक प्रकार से सत्ता समर्थक विधायक जो मुख्यमंत्री का अधिकृत सलाहकार पद भी ग्रहण किए हुए है ने अध्यक्ष की व्यवस्था नहीं मानी। सदन के संचालन की प्रक्रिया के नियमों में ऐसी व्यवस्था है कि कोई भी सदस्य यदि किसी मंत्री के जवाब से संतुष्ट न हो तो उस पर आगे चर्चा करवा सकता है मगर वह चर्चा किसी प्रस्ताव के जरिये ही हो सकती है। प्रस्ताव लाकर और उसके लिए निर्धारित समय पर अपनी बात कहने का धीरज अब कोई विधायक नहीं दिखाता। सदन में अधिकतर मानले जिन पर हंगामा होता है वे जनता के मुद्दे ही होते हैं। उन पर यदि मंत्री अपना जवाब अपने को सर्वज्ञ मान कर न दे और और ऐसा व्यवहार रखे जिससे सामने वाले को लगे कि उसकी बात को समझा जा रहा है तो हालात नहीं बिगड़ते। मगर जब दोनों तरफ से बाहें चढ़ी हों तब अध्यक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि सदन की कार्यवाही का सुचारु संचालन उनके हाथ में होता है।
सदन में यह घटना जिसमें अध्यक्ष का गुस्सा स्पष्ट नज़र आया के बारे में कोई दो राय नहीं हो सकती कि अध्यक्ष सदन को सुचारू रूप से चलाना चाहते थे और सदस्य उनके आदेश की अवमानना कर रह थे। संसदीय मर्यादा यह होती है कि जब अध्यक्ष ने कोई निर्णय दे दिया तो उसकी पालना की जाए। संसदीय मर्यादा तो यहां तक है कि जब आसन पैरों पर हो तब सदन के सभी सदस्यों को अपने अपने स्थान पर बैठ जाना चाहिए। लेकिन हमारा संसदीय लोकतंत्र भीडतंत्र में तब्दील होता जा रहा लगता है। अध्यक्ष का सदस्य को सदन से बाहर करने का आदेश देते हुए मार्शल से “थ्रो हिम आउट” शब्दों का उपयोग करते हुए कहना अध्यक्ष की गरिमा के अनुकूल नहीं कहा जा सकता। “थ्रो हिम आउट” का अर्थ है “बाहर फेंक दो”। इन शब्दों की जगह अध्यक्ष अंग्रेजी में “गेट हिम आउट” भी कह सकते थे कि (इन्हें बाहर निकाल दिया जाए)। एक निर्वाचित प्रतिनिधि के लिए अध्यक्ष के शब्द “थ्रो हिम आउट” भले ही विधान सभा में मान्य हो मगर जनता की अदालत में वे अमर्यादित माने जाएंगे। सामान्य शिष्टाचार ही नहीं वैधानिक व्यवहार भी इसकी इजाजत नहीं देता। अध्यक्ष को यदि किसी सदस्य के आचरण पर आपत्ति है तो वह उसे टोक सकता है। टोकने पर वह न माने तो अध्यक्ष चेतावनी दे सकता है कि वह उसका नाम लेकर पुकारेगा। अध्यक्ष द्वारा किसी सदस्य का नाम लेकर पुकारना उसकी निंदा करना होता है। यह सारा होने पर भी यदि अध्यक्ष को लगे कि कोई सदस्य अव्यवस्था बना रहा है तो वह उसे सदन से बाहर जाने का आदेश दे सकता है। यदि इस आदेश की वह सदस्य पालना न करे तब अध्यक्ष मार्शल को बुला कर उस सदस्य को सदन से बाहर ले जाने का कह सकता है। मगर ऐसा दुर्लभ से दुर्लभ स्थिति में होता है। मुद्दे को उठाने वाला सदस्य आवेश में आ जाए यह तो समझ में आता है किन्तु अध्यक्ष गुस्सा कर बैठे या अपना आपा खो बैठे ऐसा लोकतांत्रिक संसदीय परंपरा में नहीं होता। अध्यक्ष की कुर्सी को “आसन” कहा जाता है। “आसन” ऋषि का होता है। “आसन” देवता का होता है। ऐसी गरिमा दी गई है सदन के अध्यक्ष की कुर्सी को। भारतीय संविधान की धारा 178 के तहत यह एक संवैधानिक पद है। वह विधान सभा के सदस्यों की सामूहिक आवाज का प्रतिनिधित्व करता है। वह उनका एकमात्र प्रतिनिधि होता है। इसलिए आसन पर बैठने वाला व्यक्ति संवैधानिक मर्यादाओं से बंधा होता है और उस पर महत्ती जिम्मेवारी आ जाती है। मगर लोक में वर्तमान अध्यक्ष की छवि उनके काम करने के तरीकों तथा व्यवहारों से ऐसी बनी हुई है कि वे तुनकमिजाजी हैं। पिछले साल एक काबीना मंत्री के व्यवहार से वे इतने क्षुब्ध हुए कि सदन की कार्यवाही ही अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दी। हालांकि दूसरे दिन उन्होंने सदन की बैठक फिर आहूत कर ली। उनका यह व्यवहार जहां यह दर्शाता है कि वे सदन में नियमों की कड़ाई से पालना करवाने के अपने दायित्व के प्रति अत्यंत गंभीर रहते हैं वहीं उनकी यह मानवीय कमजोरी भी दर्शाता है कि वे जरा-जरा सी बात पर भड़क जाते हैं। उनके सामने कुछ गलत हो रहा हो तो वे झल्ला जाते हैं या क्रोध में भर जाते हैं।
अध्यक्ष का धैर्य तब जवाब दे जाता है जब सदन के सदस्य बेकाबू हो जाते हैं और भूल जाते हैं कि वे किसी नुक्कड़ सभा में नहीं बल्कि लोकतंत्र का सबसे प्रमुख माने जाने वाले पाये निर्वाचित सदन में भाग ले रहे हैं। समाजवादी नेता मधु लिमये ने एक बार कहा था कि “सदन जन आंदोलनों का विकल्प नहीं हो सकता। वह जन सेवा तथा लोगों की तकलीफों को रखने का मंच हो सकता है। इसका उपयोग आमजन की आशाओं तथा आकांक्षाओं को प्रस्तुत करने के लिए किया जाना चाहिए।” मगर सदन में अनेक बार ऐसे दृश्य देखने को मिलते हैं जैसे लोग सड़क पर आपस में झगड़ रहे हों। संविधान निर्माताओं ने ऐसी परिस्थिति की शायद कल्पना नहीं की थी। पहली बार 1952 में जब जनता से सीधे निर्वाचित होकर उनके प्रतिनिधि विधान सभा में पहुंचे थे तब उन्हें लोकतंत्र की और संवैधानिक कार्यप्रणाली की कोई जानकारी नहीं थी। किन्तु उन्होंने जिस प्रकार सदन में व्यवहार किया उससे देश में लोकतंत्र की मजबूत नींव पड़ी। लेकिन आज की पीढ़ी जब अपना नया इतिहास रच रही है तब गणतंत्र के 70 वर्ष बाद सदन में जैसा व्यवहार नज़र आता है उससे किसी को गर्व की अनुभूति नहीं होती।
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सबको खुश रखने का प्रयास करते हुए राज्य विधान सभा में प्रस्तुत किये गये घोषणाओं से भरपूर 2022-23 के बजट पर राजनीतिक पक्ष-विपक्ष में खड़े रहने वालों की आशानुरूप प्रतिक्रियाएं आ चुकी हैं। एक हफ्ते से अधिक के गुजर जाने के बाद जब उनका शोर शांत हो चला है तो अब यह वक़्त है जब राजनीति का चश्मा उतार कर इस बजट भाषण को गंभीरता से टटोला जाय। बजट भाषण कोरी घोषणाओं का पुलिंदा नहीं होता। उसे “आय व्यय का विवरण” कहा जाता है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखाकार अपनी हर ऑडिट रिपोर्ट में यह बात लिखते हैं कि “बजट की वार्षिक कवायद सार्वजनिक संसाधनों का कुशल उपयोग करने के लिए रोडमैप का विवरण देने का एक साधन” है। इसीलिये वित्त मंत्री सदन में सरकार की आमद और खर्च का पाई-पाई का हिसाब देता है कि वह किस प्रकार व कहां से आता है और किस प्रकार तथा कहां खर्च किया जाता है। संसदीय गणतंत्र में इसकी व्यवस्था संविधान में की हुई है ताकि “हम भारत के लोग” जान सकें कि हमारे प्रतिनिधि किस प्रकार शासन की व्यवस्था चला रहे हैं।
सबसे पहले बजट भाषण पर ध्यान स्वाभाविक रूप से उसे प्रस्तुत करने वाले की टोन अर्थात लहजे पर जाएगा। इसका संकेत मुख्य मंत्री अशोक गहलोत, जो वित्त विभाग के भी प्रभारी भी हैं, ने अपना अब तक का सर्वकालिक लंबा भाषण देते हुए शुरू में ही एक शेर पढ़ते हुए दे दिया जब उन्होंने हंसी-हंसी में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की तरफ मुखातिब होते हुए कहा कि वे इस बार उनकी भाषा बोलेंगे। और उन्होंने ऐसा ही किया। राजे एक बड़े पूर्व राज घराने से आती हैं तो उनकी भाषा और लहजे में लोकतांत्रिक परंपराओं को सम्मान देते हुए भी पुरानी राजसी ठसक आ ही जाती थी जब वे बजट भाषण पढ़ती थीं। वह ठसक बीच-बीच में शेर-ओ-शायरी की नहीं होती थी बल्कि एक राजा के दंभ की होती थी। उन्होंने यह माना हुआ था कि निर्वाचित प्रतिनिधि भी नई लोकतांत्रिक व्यवस्था में “राजा” ही होता है। इसलिए उनके बजट भाषणों में “मैं” शब्द का प्रयोग बहुतायत से होतब था। उन्हीं की राह पर चलते हुए गहलोत भी अपने बजट भाषण में दर्जनों बार कह गए “मैं घोषणा करता हूं”। बजट किसी व्यक्ति का नहीं होता जिसे कोई कह सके कि मैं यह दे रहा हूं। सदन को यदि लोकतंत्र का मंदिर मानें तो वहां “मैं” कोई नहीं होता। सब हम होते हैं। मुख्यमंत्री भी हमारी सुंदर संवैधानिक व्यवस्था में “मैं” नहीं होता वह मंत्रिमंडल में “वन अमंग इक्वल” (समानों में एक) होता है। हमारी संवैधानिक शासन व्यवस्था में सामूहिक दायित्व का प्रावधान है। इसलिये इस बजट भाषण में सबसे पहले हमारा ध्यान उनके “मैं” का दंभ खींचता है। लोकतंत्र में उभर रही ये प्रवत्तियां पुराने ठकुराहट वाले सामंती युग की याद दिलाती है जिसे इतिहास कूड़ेदान में फेंक चुका है। जब कुछ दिया जाता है तो उसमें अंतर्निहित बात यह होती है कि कोई अपने पास से दे रहा है। उसमें से दे रहा है जो उसकी अपनी है। हमारी संवैधानिक संसदीय व्यवस्था में शासन निर्वाचित प्रतिनिधियों के जरिये जनता का होता है न कि किसी मुख्यमंत्री या पार्टी का। हमारे संविधान में सार्वभौम सत्ता या राज किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के पास नहीं है और न राष्ट्रपति के पास है। वह है भारत के नागरिकों के पास। इसलिए शासन का खजाना राजकोष कहलाता है। अंग्रेजी में इसे “पब्लिक एक्सचेकर” कहते हैं। राजकोष बनता है नागरिकों से प्राप्त होने वाले राजस्व तथा अन्य आय से। शासन का काम नागरिकों से राजस्व प्राप्त कर जनता की सुविधाओं पर यथोचित तरीके से खर्च करना होता है। इसिलिये अर्थशास्त्री बजट का विश्लेषण और उसकी समीक्षा उसमें अंतर्निहित प्रवत्तियों को टटोलते हुए करते हैं। लोकहितकारी शासन के बजट का दर्शन इस बात से आंका जाएगा कि वह जनता के पैसे का किस प्रकार किफायत से उपयोग करता है और आय तथा व्यय का किस प्रकार प्रबंधन करता है जिससे सबका सहज विकास संभव हो। यह बजट भाषण यह दर्शाता है कि बावजूद भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) की बार बार की चेतावनियों के राज्य सरकार को अपने राजस्व घाटे की कोई चिंता नहीं है और वह ‘ऋणम् कृत्वा घृतम पीवेत’ को अपना मंत्र मां कर उधार लेकर काम चला रही है। बजट के आंकड़े खुद अपनी कहानी कहते हैं। अगले वर्ष के बजट में 23 हजार 488 करोड़ 56 लाख रुपये का राजस्व घाटा बताया गया है और पूंजी खाते या कहें उधारी खाते में लगभग इतना ही 23 हजार 607 करोड़ 95 लाख रुपये का आधिक्य बताया गया है। अर्थात सरकार अपनी आमद से जो ज्यादा खर्च कर रही है वह उधार ले कर कर रही है। सच्चाई तो यह भी है कि जितने घाटे का बजट अनुमान लगाया जाता है वह साल पूरा होते बढ़ जाता है। पिछले साल का ही देंखें। इन्हीं मुख्यमंत्री ने पिछले साल बजट प्रस्तुत करते हुए 23 हजार 750 करोड़ 4 लाख रूपयों के राजस्व घाटे का अनुमान लगाया था। इस बजट में जब पिछला हिसाब दिया तो पता चला कि वास्तव में वह घाटा बढ़ कर 35 हजार 689 करोड़ 36 लाख रुपये पंहुच गया है। इसके बाद भी अपने बजट भाषण में उन्होंने राज्य सरकार के वित्तीय प्रबंधन की तारीफ की। राज्य का वित्तीय प्रबंधन और बजट तब गड़बड़ाते हैं जब राजनेता राज्य की आर्थिक बुनियाद मजबूत करके लोगों को स्थाई राहत देने की बजाय उसे चुनावी राजनीति का औजार बना लेते हैं। पिछले लंबे समय से ऐसा चल रहा है।
पहला जेंडर बजट (2012-13) और पहला पेपरलैस बजट (2021-22) पेश करने के लिए अपनी ही पीठ थपथपाते हुए मुख्यमंत्री ने इस बार पहले “कृषि बजट” के नाम पर जो पेश किया वह मूल बजट में कृषि वाले पैरे को अलग से पढ़ने के अलावा कुछ नहीं था। पहले किसी विषय पर किसी वित्तीय वर्ष में अधिक ध्यान देना होता तो वह बजट उस विषय को समर्पित करके किया जाता था जैसे स्वास्थ्य को समर्पित बजट या शिक्षा को समर्पित बजट। मगर इस बार दिल्ली के आसपास चली किसानी राजनीति के चलते कृषकों की सहानुभूति पाने के लिए समर्पित बजट को अलग से कृषि बजट के नाम का मुलम्मा चढ़ा दिया गया। जादूगरी यही की गई है कि कृषि वाला पैरा अलग से कृषि बजट का नाम देकर पढ़ दिया गया है। कृषि अर्थशास्त्रियों को बड़ी बेताबी से इंतज़ार था इस कृषि बजट का। वे समझना चाहते थे कि कृषि और किसानों की बातें करने वाले नीति निर्माता किस प्रकार कृषि को राज्य की समूची अर्थव्यवस्था में देखते हैं और ऐसा क्या करते हैं जिससे कृषि पर आश्रित आबादी की तकदीर सुधर सके। कृषि का अलग बजट उसी तर्ज पर होता जिस प्रकार पहले रेल्वे बजट होता था जो मूल बजट से एक दिन पहले अलग से संसद में प्रस्तुत होता था तो जरूर कहा जा सकता था कि राज्य सरकार कृषि का अलग बजट लेकर आई है।
इस बजट में एक ऐसी घोषणा की गई है जो अन्य सभी घोषणाओं पर भारी है। शासनरूढ़ दल को यह लगने लगा है कि जैसे कोई अलादीन का चिराग घिस दिया गया है जबकि यह घोषणा कार्यपालिका के उस तंत्र को साधने के लिए की गई है जो पहले ही बड़े दुलार से रखा जाता है। यह घोषणा है पुरानी पेंशन योजना को पिछली तारीख से फिर लागू करना। यह घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री बड़ी सलोनी अदा से कहने की चेष्टा की कि जैसे उन्हें मालूम ही नहीं कि किन परिस्थितियों में एक लंबे विमर्श के बाद एक जनवरी 2004 से नई पेंशन योजना क्यों लागू हुई। शायद किसी को याद नहीं कि एक समय ऐसा भी आया था कि किसी कर्मचारी के रिटायर होने पर मिलने वाले परिलाभ देने के भी सरकार के पास पैसे नहीं होते थे और उन्हें सरकारी बॉन्ड दे कर भुगतान टाला जाता था। मुख्यमंत्री बजट भाषण में कहते हैं “पेंशन के लगातार बढ़ते वित्तीय भार को कम करने की दृष्टि से ऐसा कदम उठाया गया होगा”। पुरानी पेंशन व्यवस्था फिर लाते हुए उन्होंने जहा कि “नवीन पेंशन स्कीम के कारण अभी से ही कार्मिकों में सेवानिवृत्ति के उपरांत वृद्धावस्था में जीवन यापन के लिए भारी असुरक्षा का भाव उत्पन्न हो गया है…सरकारी शासन से जुड़े कर्मचारी भविष्य के प्रति सुरक्षित महसूस करें, तभी वे सेवाकाल में सुशासन के लिए अपना अमूल्य योगदान दे सकते हैं”। यह भी कहा गया कि “सरकारी कर्मचारियों को रिटायर होने के बाद आत्मसम्मान से जीने के लिए ये बहुत ज़रूरी था”। तो क्या निजी क्षेत्र के कर्मचारियों या असंगठित मजदूरों को एक उम्र के बाद आत्मसम्मान से जीने का अधिकार नहीं है? वास्तव में तो वे बहुसंख्यक लोग हैं जिन्हें सहारा चाहिए। दूसरी तरफ सरकारी कर्मियों को नागरिकों के प्रति जवाबदेह बनाने से सरकार का लगातार कतराना भी जवाब मांगता है। इस सत्र में भी जवाबदेही कानून बनाने का विधेयक लाने में सरकार असफल रही है। वर्ष 2018 में राज्य विधान सभा चुनावों के लिए जारी अपने चुनाव घोषणापत्र में कांग्रेस ने यह वादा किया गया था कि उसकी सरकार बनती है तो जवाबदेही का कानून लाया जाएगा। इसे 10 जुलाई 2019 को परिवर्तित बजट प्रस्तुत करते हुए मुख्यमंत्री ने फिर दोहराया था कि लोकसेवकों की जवाबदेही के लिए ‘सार्वजनिक जवाबदेही कानून’ लाया जायेगा जो समस्त विभागों, प्राधिकरणों व निगमों पर लागू होगा। मगर अभी तो सरकारी कर्मियों को खुश रखना है। इस बजट के लिए सरकार अपने सीने पर कितने ही तमगे लगा ले, पर इस बजट में न्याय और समानता का कोई आर्थिक दर्शन नज़र नहीं आता।
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