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Editorial – Vinay Express https://vinayexpress.in खबर हमारी विश्वास आपका Mon, 08 Jun 2026 21:11:36 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0 झालावाड़ स्कूल हादसा, प्रशासनिक लापरवाही की त्रासदी : विनय थानवी https://vinayexpress.in/2025/07/25/editorial-article-by-vinay-thanvi-2/ Fri, 25 Jul 2025 17:59:27 +0000 https://vinayexpress.in/?p=91591 विनय एक्सप्रेस समाचार, बीकानेर। संपादकीय आलेख, विनय थानवी।
25 जुलाई 2025 को राजस्थान के झालावाड़ जिले के मनोहरथाना क्षेत्र के पीपलोदी गांव में एक सरकारी स्कूल की छत गिरने से हुई त्रासदी ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। इस हादसे में सात मासूम बच्चों की जान चली गई, जबकि 27 से अधिक बच्चे घायल हुए। यह घटना न केवल एक दुखद हादसा है, बल्कि यह प्रशासनिक व्यवस्था की विफलता और लापरवाही का जीवंत प्रमाण है। यह हादसा हमें उन गहरे सवालों की ओर ले जाता है, जो सरकारी स्कूलों की जर्जर अवस्था, प्रशासनिक उदासीनता और बच्चों की सुरक्षा के प्रति गंभीरता की कमी को उजागर करते हैं।

हादसे का दर्दनाक परिदृश्य

पीपलोदी के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय में सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान अचानक छत ढह गई। इस समय स्कूल में करीब 60 बच्चे मौजूद थे, जिनमें से कई मलबे में दब गए। स्थानीय ग्रामीणों, पुलिस और प्रशासन की तत्परता से राहत और बचाव कार्य शुरू किया गया, लेकिन तब तक कई मासूम जिंदगियां असमय काल के गाल में समा चुकी थीं। एक छात्रा के बयान के अनुसार, छत से कंकड़ गिरने की शिकायत बच्चों ने शिक्षकों से की थी, लेकिन उनकी अनदेखी ने इस त्रासदी को और गंभीर बना दिया। यह हादसा केवल एक इमारत के ढहने की कहानी नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और जिम्मेदारी की कमी की दु:खद परिणति है।

प्रशासनिक व्यवस्था की नाकामी

यह हादसा तब हुआ, जब शिक्षा विभाग ने 14 जुलाई 2025 को ही सभी जिलों को मानसून से पहले स्कूल भवनों की जांच और मरम्मत के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद, झालावाड़ जिला प्रशासन ने इस आदेश को गंभीरता से नहीं लिया। स्थानीय लोगों के अनुसार, स्कूल की इमारत लंबे समय से जर्जर थी, और इसकी मरम्मत के लिए कई बार शिकायत की गई थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। यह स्पष्ट है कि जिला स्तर पर न तो स्कूल भवनों का नियमित निरीक्षण किया गया और न ही समय पर मरम्मत के लिए कदम उठाए गए। प्रदेश स्तर पर भी स्थिति चिंताजनक है। शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने स्वीकार किया कि राज्य में हजारों स्कूल भवन जर्जर हैं, और उनकी मरम्मत के लिए 200 करोड़ रुपये का प्रस्ताव तैयार किया गया है। लेकिन सवाल यह है कि जब शिक्षा विभाग और प्रशासन को पहले से ही जर्जर भवनों की जानकारी थी, तो समय पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई? यह लापरवाही केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं है; राजस्थान के कई ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों की स्थिति बदहाल है, और यह हादसा इस सच्चाई को उजागर करता है।

नेताओं की प्रतिक्रिया और जिम्मेदारी

हादसे के बाद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने शोक व्यक्त करते हुए घायल बच्चों के इलाज के लिए निर्देश दिए। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे ने भी इस घटना पर दु:ख जताया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी शोक व्यक्त किया और राहत कार्यों में सहयोग की अपील की। शिक्षा विभाग ने प्रारंभिक कार्रवाई के तहत स्कूल के पांच शिक्षकों को निलंबित किया है, लेकिन क्या यह कार्रवाई पर्याप्त है? यह हादसा केवल शिक्षकों की लापरवाही का परिणाम नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की विफलता का नतीजा है। जिम्मेदारी केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर डालकर उच्च अधिकारियों की जवाबदेही को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

शिक्षा व्यवस्था पर सवाल

झालावाड़ का यह हादसा राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाता है। एक ओर सरकार स्मार्ट शिक्षा को बढ़ावा देने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (UDISE+) के आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान में सरकारी स्कूलों में दाखिलों की संख्या में कमी आ रही है। 2021-22 में जहां 99.12 लाख बच्चों ने दाखिला लिया था, वहीं 2023-24 में यह संख्या घटकर 83.81 लाख रह गई। इसका कारण स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी और जर्जर भवनों जैसी आधारभूत समस्याएं हैं।

आगे की राह

इस त्रासदी से सबक लेते हुए सरकार को तत्काल कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, सभी सरकारी स्कूलों का सुरक्षा ऑडिट किया जाना चाहिए, और जर्जर भवनों की मरम्मत को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। दूसरा, स्कूलों में आपातकालीन निकास, फायर ड्रिल और प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। तीसरा, शिक्षकों और स्कूल स्टाफ को रेस्क्यू और प्राथमिक चिकित्सा की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। इसके साथ ही, प्रशासनिक जवाबदेही तय करने के लिए एक स्वतंत्र जांच समिति का गठन किया जाना चाहिए, जो इस हादसे के कारणों की गहराई से जांच करे और  को दंडित करे।

झालावाड़ का स्कूल हादसा एक चेतावनी है कि बच्चों की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। यह घटना न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि यह भी बताती है कि सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने के लिए नीतिगत और व्यावहारिक स्तर पर गंभीर प्रयासों की जरूरत है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में ऐसी त्रासदी दोबारा न हो। मासूम बच्चों की जान की कीमत पर प्रशासनिक सुस्ती को और बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। यह समय केवल शोक व्यक्त करने का नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई करने का है, ताकि हर बच्चा स्कूल में सुरक्षित रह सके और शिक्षा का अधिकार सही मायने में साकार हो।

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महाजनी संस्कृति के जाल में फंसी है शिक्षा व्यवस्था : पढ़िए अतिथि संपादक, राजेन्द्र बोड़ा का शिक्षण के बाज़ारी मायाजाल पर केंद्रित यह आलेख https://vinayexpress.in/2022/08/19/guest-editorial-by-rajendra-bora/ Fri, 19 Aug 2022 13:21:29 +0000 https://vinayexpress.in/?p=41553
विनय एक्सप्रेस अतिथि संपादकीय- राजेन्द्र बोड़ा (वरिष्ठ पत्रकार एवं विश्लेषक) विलासिता खुली अर्थव्यवस्था का एक आवश्यक अंग है। विलासिता पर लोग खर्च करते हैं उससे, मॉल सजते हैं, बाज़ार चलता है। जनसंचार के माध्यमों पर चल रहे प्रचार तंत्र के जरिये बाज़ार हमें उन चीजों पर खर्च करने को प्रेरित करता है जो वास्तव में हमारे जीवन की मूलभूत जरूरतें नहीं होतीं, विलासिता की वस्तुएं होती हैं। समाजशास्त्री मानते हैं कि पूंजीवाद और वामपंथ दोनों का अंतिम सामाजिक लक्ष्य एक ही है। वह लक्ष्य है सब तक विलासिता पहुंचाना। दोनों विचारधाराओं के रास्ते भले ही अलग-अलग हों, मगर लक्ष्य एक ही रहा है। वामपंथ के शासन में कठोर नियंत्रण से सबको बराबर विलासिता का हक़ सुनिश्चित करने के प्रयास किये गए। दूसरी तरफ पूंजीवाद भी विलासिता में सबकी बराबर भागीदारी चाहता है मगर यह बाज़ार की व्यवस्था में शासन की कम से कम दखलंदाजी तथा निजी पूंजी को सुनिश्चित करता है और लोगों की स्वतंत्र रूप से चुनने का मंत्र देता है। इन दोनों के बीच समाजवाद भी होता है जिसके समर्थक व्यक्ति की स्वतन्त्रता के साथ शासन के जरिये सामाजिक नियंत्रण पर राजी हो लेते हैं। लेकिन इक्कीसवीं सदी का यह समय ऐसा है जब विज्ञान आधारित तकनीकी बदलाव जबर्दस्त तेजी से हमारे जीवन को प्रभावित कर रहा है। मानव अपने इतिहास में इतनी तेजी से ऐसा बदलाव पहली बार अनुभव कर रहा है। इन्हीं बदलावों और जरूरतों के चलते हुए नई आर्थिक नीतियां आमूल परिवर्तनों की तरफदारी करती हैं। हम सहमत हों या असहमत, बदलाव को हमें स्वीकार करना पड़ेगा। इसके अलावा हमारे पास अन्य कोई चारा भी नहीं है। पूंजीवाद की बाढ़ का जो दरवाजा कांग्रेस की सरकार ने खोला था उसे बंद करना अब असंभव है। अब हर तरफ पूंजी का बोलबाला है और सभी उसी की शरण में है उसी प्रकार जैसे “बुद्धम शरणम गच्छामि”! या फिर भक्ति काल में “कृष्णम शरणम ममः”। ऐसे भारतीय मन को पहले राजा या सामंतशाही ने और बाद में हल्के वामपक्ष की ओर झुकाव लिये समाजवाद ने भी आकर्षित किया। आज़ादी के बाद सब कुछ ऊपर वाला करेगा याने सरकार करेगी के भाव ने लोकतन्त्र में भी अधिनायकवाद को नए रूप में जारी रखा। इसके नतीजे में गणतन्त्र का निर्वाचित नेतृत्व का व्यवहार सामंती और अधिनायकवादी होता चला गया।
बाज़ार आस्था को भी भुना लेना जानता है। इसे विद्यानिवास मिश्र ने “महाजनी सभ्यता का इंद्रजाल” कहा था। यह इंद्रजाल हमारी सनातन परम्पराओं, जो रूढ़ियां नहीं है, की शिक्षा का शमन करता है। इसके लिए वह सबसे पहले हमारे मन को हरता है। भारतीय मन पोथी वाला मन नहीं है। इसलिए यहां की मौखिक परंपरा गहरी मानवीय संवेदना की शिक्षा देती रही है। नयी पोथियों वाली शिक्षा प्रमाणपत्र देती है। वह केवल आश्वस्त भर करती है कि विद्यार्थी ने अमुक विषय की मुख्य पोथियां पढ़ ली है और उनके बारे में पूछे गए सवालों के निर्धारित जवाब औपचारिक परीक्षा में दे दिये हैं। उत्तीर्ण छात्रों को डिग्री का प्रमाणपत्र मिलता है कि उसने शिक्षा पा ली है। ऐसे प्रमाणपत्रों की शिक्षा जीवन में दूर तक साथ नहीं चलती। विस्मृत हो जाती है, क्योंकि उसका जीवन के कारोबार में कोई उपयोग नहीं होता। इसीलिए कहा जाता है कि आज के प्रमाणपत्रों वाली शिक्षा एक गहरी मानवीय मौखिक परंपरा वाली शिक्षा की पूर्ण विस्मृति की महंगी कीमत पर प्राप्त की गई है। शिक्षा अनंत जिज्ञासा, घनी आत्मीयता, और अपार करुणा का भाव देती है। ऐसी शिक्षा की व्यवस्था प्रमाणपत्र पाने की दक्षता देने वाले व्यावसायिक शिक्षण संस्थान कैसे कर सकते हैं! प्रमाणपत्र देने वाला शिक्षण अहंकार देता है। ऐसी जीत का अहंकार जो किसी भी कीमत पर हासिल की गई हो।
एक समय जब शिक्षक ने भारतीय मौखिक परंपरा को विस्मृत नहीं किया था तब उसमें गुरुत्व था। वह प्रमाणपत्रों के लिए ही नहीं जीवन के लिए भी छात्रों को तैयार करता था। मगर आज की शिक्षा व्यवस्था विद्यार्थी को अपने आप से, अपने समाज से, अपने परिवेश से अजनबी बनाती है। हर समय चौकन्ना रहना सिखाती है कि कहीं कोई और उसे पीछे न छोड़ दे। महाजनी संस्कृति की शिक्षा के संस्थान दंभपूर्ण आडंबर ओढ़े रहते हैं। इसी चमक से वे सबको भरमाते हैं। वे विद्यार्थियों को यही सिखाते हैं कि प्रतियोगिता में चूक मत करना नहीं तो दौड़ से बाहर हो जाओगे। दौड़ो, दौड़ो। दौड़ते हुए जीतने के लिए भले ही साथ वाले को टंगड़ी मारनी पड़े या अपने प्रभाव से खेल के नियम बदलवा देने पड़ें, मगर जीतने की ज़िद पर अड़े रहो। इस प्रकार देखें तो देखें तो पूरी शिक्षा व्यवस्था में असफल के लिए कोई स्थान नहीं है। शासन हो, समाज हो, अभिभावक हो, या शिक्षक सभी केवल सफलता के गुण सिखाने के प्रयासों में लगे रहते हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि सभी सफल होना चाहते हैं। सबको लगता है कि सफलता आखिर में उनके सब ऐब छिपा देगी। आज के विद्यार्थी को यह सिखाया जा रहा है कि खेल में जीतने के लिए रैफरी को खरीदना पड़े तो वह भी जायज है क्योंकि कहीं कोई जीतने में चूक हुई नहीं कि उसकी ज़िंदगी का सुख छिन जाएगा। सभी यह कहने का पाखंड तो करते हैं कि सीखने में, आगे बढ़ने में, और सफलता पाने में असफलता आवश्यक हैं, किंतु हमें शिक्षा तो असली जिंदगी में असफलता से बचने की दी जाती है। असफलता को दंडित किया जाता है। अब तो विफलता का भूत लोगों के दिमाग पर पहले से कहीं ज्यादा हावी है। अनिश्चितताओं तथा तेजी से आ रहे परिवर्तनों ने असफलता के भूत की छाया को और अधिक विकराल कर दिया है। असफलता हमें बुरी लगती है। हमारा दिमाग गलतियों से होने वाले परिणामों पर अधिक केंद्रित रहता है, बनिस्पत कि उसके द्वारा खोले गए अवसरों के।
जब जीवन की शिक्षा में सफलता ही एकमात्र सूत्र बन जाती है तब कोई कितना ही बचे उसे झूठ, फरेब और बेईमानी की राह पर चल कर सफलता पाना आसान लगने लगता है। आश्चर्य नहीं कि आज का युवा पूछता है कि मैं अगर सत्य बोलता हूं और असफल होता हूं, तो क्या करूं? बेईमानी से बचा जाय कि सफलता छोड़ी जाए, क्या किया जाए? जैसे सवालों के जवाब हमारी आज की शिक्षा में नहीं सिखाए जाते। जीवन में बार-बार असफलता मानव के मन में एक भय पैदा करती है। इसलिए वह उन परिस्थितियों से बचने का प्रयास करता है जो उसे असफलता की ओर धकेलती है। इस भय के चलते अनेक लोग अपने सपनों से दूर चले जाते हैं और हीन भावना से भर जाते हैं। जीवन के आज के ऐसे सत्य से हमारी शिक्षा निगाह फेरे हुए है उस कि ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। हम जीवन की प्रतिकूलता के खिलाफ मजबूत बनने की कोशिश करते हैं मगर हम असफलता के विषय का जिक्र ही नहीं करते, उसे भूल जाना चाहते हैं। असफलता से हम निराश महसूस करते हैं। मनोचिकित्सक कहते हैं कि हम अपने बारे मे कैसे सोचते है और दूसरे लोगों के बारे मे कैसे सोचते है इसी में सारा रहस्य छुपा है। हमारे विचार ही हमारी भावनाओं को प्रभावित करते हैं। वे कहते हैं कि किसी परेशानी की हालत में हमारे विचार हमारी भावनाओं और हमारे शारीरिक लक्षणों को प्रभावित कर सकते है।
आज की शिक्षा व्यवस्था मानवीयता के नैतिक दायित्वों से मुंह फेरते हुए आधारहीन और मूल्यहीन राजसत्ता में अपना वर्चस्व बनाने का लोभ भी पैदा करती है। आज की शिक्षा सत्ता में कुर्सी पाने या उसे बनाए रखने के लिए अनुष्ठान करना सिखाती है। एक ठहरा हुआ मूल्य सिखाती है। जबकि असली शिक्षा निरंतर जांचा जाने वाला, और जांचा जाकर निरंतर नये रूप में निखर कर उभरने वाला मूल्य सिखाती है। बहुतों को तो यहां तक लगता है कि भारत को एक कचरा फेंकू उपभोक्ता संस्कृति वाला ऐसा देश बनाने पर हमारी मौजूदा शिक्षा व्यवस्था आमादा है जहां सभी लोग बाज़ार के शिकंजे में फंसे हों। सभी पर खरीदो-खरीदो, भले ही बैंक से उधार लेकर ही खरीदो, पर खरीदो का पागलपन सर्वत्र हावी नज़र आता है। कुछ पाने की एक अजीब सी लाचारी में सभी लोग अपने को फंसा पाते हैं। ऐसे में प्रतियोगी प्रवेश पारीक्षाएं पास करके और प्रमाणपत्र आधारित चयन प्रक्रिया की व्यवस्था से चुने जा कर बने शिक्षकों से कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि वे तत्व ज्ञान वाली भाषा बोल या समझ सकते हैं और वैसी शिक्षा दे सकते हैं। आज की शिक्षा हमें अंध विश्वासों और घोर अकर्मण्य नियतिवाद में ही धकेलती है। यह सबको स्पष्ट दीख भी रहा है। शिक्षा जब बाज़ार का हित साधने वाली बना दी जाती है तब यही होता है। ऐसा इसे कौन बनाता है? हमारे नीति निर्माता और लोकतान्त्रिक विधि से चुने हुए जन प्रतिनिधि इन हालात के जिम्मेवार हैं। हालांकि ये जन प्रतिनिधि विधि सम्मत लोकतान्त्रिक दरवाजों से होकर सत्ता में पहुंचते हैं और नीति निर्धारक बनते हैं, परंतु उनका व्यवहार दर्शाता है कि वे सिर्फ एक ही नीति जानते हैं और वह कि किस प्रकार सत्ता पर अपना कब्जा बनाये रखना और जनहित के मुखौटों के पीछे अपने लिए और अपनों के लिए हो कर रहना और काम करना। इसलिए उन्हें ऐसी शिक्षा व्यवस्था की ही दरकार रहती है जो सबको मृग मरीचिका में भटकाए रखे ताकि दौड़ते- हांफते लोगों के पास उनसे कोई सवाल करने का समय ही न रहे। इसलिए महाजनी संस्कृति उन्हें बड़ी रास आती है। मगर भारतीय मन ऐसा नहीं है।
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जानिए विधानसभा अध्यक्ष को क्यूं आता है गुस्सा ! वरिष्ठ पत्रकार एवं विश्लेषक राजेन्द्र बोड़ा की कलम से https://vinayexpress.in/2022/03/23/why-does-the-speaker-of-the-assembly-get-angry/ Wed, 23 Mar 2022 04:31:24 +0000 https://vinayexpress.in/?p=26255 विनय एक्सप्रेस एडिटोरियल। राज्य विधानसभा में जहां कभी “झूठ’ शब्द भी असंसदीय माना जाता था और जिसकी जगह “असत्य” का प्रयोग होता था वहां जिस प्रकार का व्यवहार और भाषा का उपयोग होने लगा है उसी पर आज विनय एक्सप्रेस के सुधि पाठकों हेतु वरिष्ठ पत्रकार एवं विश्लेषक श्री राजेन्द्र बोड़ा का अतिथि संपादकीय प्रस्तुत हैं :

विधानसभा में जिस प्रकार सदस्यों का आचरण हो चला है वह सबसे बड़ा सिरदर्द सदन के अध्यक्ष के लिए होता है। यह अध्यक्ष का दायित्व होता है कि सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से नियमानुसार चले। जब कोई सदस्य या बहुत से सदस्य इस प्रकार व्यवहार करने लगें जिससे सदन की कार्यवाही बाधित हो उठे तब अध्यक्ष को कड़ा रुख अपनाना पड़ता है और बाधा डाल रहे सदस्य या सदस्यों पर अनेक बार कार्यवाही करनी भी लाज़मी हो जाती है। विधानसभा के अध्यक्ष का पद गरिमा का होता है। अध्यक्ष पर उस सदन को चलाने की जिम्मेवारी होती है जहां लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए लोकतान्त्रिक तरीके से विमर्श करने के वास्ते राज्य के नागरिकों के निर्वाचित प्रतिनिधि बैठते हैं। विधानसभा के नियम सदन स्वयं बनाता है। ये नियम परंपराओं से भी बनते हैं। पिछले काल में सदन ने किस प्रकार कोई निर्णय लिया या किसी अध्यक्ष ने क्या निर्णय दिया ये सब परंपरा का हिस्सा होते हैं। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि “संसदीय लोकतंत्र में अध्यक्ष सदन की गरिमा और स्वतंत्रता का प्रतिनिधित्व करता है, और क्योंकि सदन देश का प्रतिनिधित्व करता है इसलिए स्पीकर एक तरह से देश की स्वतंत्रता और स्वतंत्रता का प्रतीक बन जाता है।” जो बात नेहरू ने लोकसभा अध्यक्ष के लिए कही वही बात राज्य विधानसभा के अध्यक्ष पर भी लागू होती है। पिछले दिनों राज्य विधान सभा में कांग्रेस को समर्थन दे रहे एक निर्दलीय विधायक जिन्हें मुख्यमंत्री का सलाहकार बनाया हुआ है के आचरण और उस पर विधानसभा अध्यक्ष द्वारा “थ्रो हिम आउट” (उन्हें बाहर फेंक दो) कहते हुए सदन से बाहर निकालने का मर्शाल को आदेश देने की घटना हमें बदलते लोकतान्त्रिक व्यवहारों के संकेत देती है। राज्य विधान सभा में जो कुछ हुआ उससे आमजन में निर्वाचित सदन की छवि को धक्का ही लगा है। क्योंकि अध्यक्ष का काम सदन में व्यवस्था और मर्यादा बनाए रखने का होता है इसलिए उसका अपना व्यवहार ऐसा गरिमामय होने की अपेक्षा स्वभावतः होती है जिसे देख कर सदन के सदस्य उनका अनुसरण करें। सदन में कितना भी तनाव हो जाए और उत्तेजित सदस्य आपे से बाहर होकर मर्यादाएं भूल जाएं तब भी खुद बिना उत्तेजित हुए शांत बने रह कर सदन का संचालन करने की जिम्मेवारी अध्यक्ष पर आ जाती है। एक प्रकार से उसे सदन का सबसे धीरज वाला सदस्य होने का परिचय देना होता है। अनेक बार ऐसे मौके आ जाते हैं जब उसका धीरज जवाब देने के हालात बन जाते हैं। ऐसे में ही सदन के अध्यक्ष के आसन पर बैठे व्यक्ति की परीक्षा होती है। ऐसा नहीं है कि राज्य विधान सभा के पिछले 14 कार्यकालों में बड़े हंगामे नहीं हुए हों। विभिन्न काल के अध्यक्षों ने जब भी सदन में व्यवस्था बिगड़ी और कार्यवाही में बाधा पड़ी तब कडा रुख अपनाया मगर कभी किसी अध्यक्ष ने अपना धीरज नहीं खोया। कभी गुस्से का इजहार नहीं किया। कह सकते हैं कि राजस्थान विधानसभा के इतिहास में किसी भी अध्यक्ष ने किसी भी उत्तेजना के माहौल में कभी “रिंग मास्टर” जैसी भूमिका नहीं निभाई। राज्य विधान सभा के अध्यक्ष रहे पूनमचंद विश्नोई ने एक बार किसी मुद्दे पर सदन में कहा था कि “अध्यक्ष को स्पीकर कहा जाता है, किन्तु उसका काम सबसे कम बोलना होता है।” वे यह भी मानते थे कि अनेक बार सदस्य “सदन के कार्य संचालन नियमों से बाहर जाकर तुरंत अपनी बात कहने की अधीरता दिखाते हैं।” चतुर अध्यक्ष सबको थोड़ी ढील देते हुए सामंजस्य बनाए रख कर सदन को सुचारु रूप से चला लेता है। यह भी सच है कि सदन को सुचारु रूप से चलाने की जिम्मेवारी बहुमत वाले हां पक्ष की होती है। इस घटनाक्रम में एक प्रकार से सत्ता समर्थक विधायक जो मुख्यमंत्री का अधिकृत सलाहकार पद भी ग्रहण किए हुए है ने अध्यक्ष की व्यवस्था नहीं मानी। सदन के संचालन की प्रक्रिया के नियमों में ऐसी व्यवस्था है कि कोई भी सदस्य यदि किसी मंत्री के जवाब से संतुष्ट न हो तो उस पर आगे चर्चा करवा सकता है मगर वह चर्चा किसी प्रस्ताव के जरिये ही हो सकती है। प्रस्ताव लाकर और उसके लिए निर्धारित समय पर अपनी बात कहने का धीरज अब कोई विधायक नहीं दिखाता। सदन में अधिकतर मानले जिन पर हंगामा होता है वे जनता के मुद्दे ही होते हैं। उन पर यदि मंत्री अपना जवाब अपने को सर्वज्ञ मान कर न दे और और ऐसा व्यवहार रखे जिससे सामने वाले को लगे कि उसकी बात को समझा जा रहा है तो हालात नहीं बिगड़ते। मगर जब दोनों तरफ से बाहें चढ़ी हों तब अध्यक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि सदन की कार्यवाही का सुचारु संचालन उनके हाथ में होता है।

सदन में यह घटना जिसमें अध्यक्ष का गुस्सा स्पष्ट नज़र आया के बारे में कोई दो राय नहीं हो सकती कि अध्यक्ष सदन को सुचारू रूप से चलाना चाहते थे और सदस्य उनके आदेश की अवमानना कर रह थे। संसदीय मर्यादा यह होती है कि जब अध्यक्ष ने कोई निर्णय दे दिया तो उसकी पालना की जाए। संसदीय मर्यादा तो यहां तक है कि जब आसन पैरों पर हो तब सदन के सभी सदस्यों को अपने अपने स्थान पर बैठ जाना चाहिए। लेकिन हमारा संसदीय लोकतंत्र भीडतंत्र में तब्दील होता जा रहा लगता है। अध्यक्ष का सदस्य को सदन से बाहर करने का आदेश देते हुए मार्शल से “थ्रो हिम आउट” शब्दों का उपयोग करते हुए कहना अध्यक्ष की गरिमा के अनुकूल नहीं कहा जा सकता। “थ्रो हिम आउट” का अर्थ है “बाहर फेंक दो”। इन शब्दों की जगह अध्यक्ष अंग्रेजी में “गेट हिम आउट” भी कह सकते थे कि (इन्हें बाहर निकाल दिया जाए)। एक निर्वाचित प्रतिनिधि के लिए अध्यक्ष के शब्द “थ्रो हिम आउट” भले ही विधान सभा में मान्य हो मगर जनता की अदालत में वे अमर्यादित माने जाएंगे। सामान्य शिष्टाचार ही नहीं वैधानिक व्यवहार भी इसकी इजाजत नहीं देता। अध्यक्ष को यदि किसी सदस्य के आचरण पर आपत्ति है तो वह उसे टोक सकता है। टोकने पर वह न माने तो अध्यक्ष चेतावनी दे सकता है कि वह उसका नाम लेकर पुकारेगा। अध्यक्ष द्वारा किसी सदस्य का नाम लेकर पुकारना उसकी निंदा करना होता है। यह सारा होने पर भी यदि अध्यक्ष को लगे कि कोई सदस्य अव्यवस्था बना रहा है तो वह उसे सदन से बाहर जाने का आदेश दे सकता है। यदि इस आदेश की वह सदस्य पालना न करे तब अध्यक्ष मार्शल को बुला कर उस सदस्य को सदन से बाहर ले जाने का कह सकता है। मगर ऐसा दुर्लभ से दुर्लभ स्थिति में होता है। मुद्दे को उठाने वाला सदस्य आवेश में आ जाए यह तो समझ में आता है किन्तु अध्यक्ष गुस्सा कर बैठे या अपना आपा खो बैठे ऐसा लोकतांत्रिक संसदीय परंपरा में नहीं होता। अध्यक्ष की कुर्सी को “आसन” कहा जाता है। “आसन” ऋषि का होता है। “आसन” देवता का होता है। ऐसी गरिमा दी गई है सदन के अध्यक्ष की कुर्सी को। भारतीय संविधान की धारा 178 के तहत यह एक संवैधानिक पद है। वह विधान सभा के सदस्यों की सामूहिक आवाज का प्रतिनिधित्व करता है। वह उनका एकमात्र प्रतिनिधि होता है। इसलिए आसन पर बैठने वाला व्यक्ति संवैधानिक मर्यादाओं से बंधा होता है और उस पर महत्ती जिम्मेवारी आ जाती है। मगर लोक में वर्तमान अध्यक्ष की छवि उनके काम करने के तरीकों तथा व्यवहारों से ऐसी बनी हुई है कि वे तुनकमिजाजी हैं। पिछले साल एक काबीना मंत्री के व्यवहार से वे इतने क्षुब्ध हुए कि सदन की कार्यवाही ही अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दी। हालांकि दूसरे दिन उन्होंने सदन की बैठक फिर आहूत कर ली। उनका यह व्यवहार जहां यह दर्शाता है कि वे सदन में नियमों की कड़ाई से पालना करवाने के अपने दायित्व के प्रति अत्यंत गंभीर रहते हैं वहीं उनकी यह मानवीय कमजोरी भी दर्शाता है कि वे जरा-जरा सी बात पर भड़क जाते हैं। उनके सामने कुछ गलत हो रहा हो तो वे झल्ला जाते हैं या क्रोध में भर जाते हैं।

 

अध्यक्ष का धैर्य तब जवाब दे जाता है जब सदन के सदस्य बेकाबू हो जाते हैं और भूल जाते हैं कि वे किसी नुक्कड़ सभा में नहीं बल्कि लोकतंत्र का सबसे प्रमुख माने जाने वाले पाये निर्वाचित सदन में भाग ले रहे हैं। समाजवादी नेता मधु लिमये ने एक बार कहा था कि “सदन जन आंदोलनों का विकल्प नहीं हो सकता। वह जन सेवा तथा लोगों की तकलीफों को रखने का मंच हो सकता है। इसका उपयोग आमजन की आशाओं तथा आकांक्षाओं को प्रस्तुत करने के लिए किया जाना चाहिए।” मगर सदन में अनेक बार ऐसे दृश्य देखने को मिलते हैं जैसे लोग सड़क पर आपस में झगड़ रहे हों। संविधान निर्माताओं ने ऐसी परिस्थिति की शायद कल्पना नहीं की थी। पहली बार 1952 में जब जनता से सीधे निर्वाचित होकर उनके प्रतिनिधि विधान सभा में पहुंचे थे तब उन्हें लोकतंत्र की और संवैधानिक कार्यप्रणाली की कोई जानकारी नहीं थी। किन्तु उन्होंने जिस प्रकार सदन में व्यवहार किया उससे देश में लोकतंत्र की मजबूत नींव पड़ी। लेकिन आज की पीढ़ी जब अपना नया इतिहास रच रही है तब गणतंत्र के 70 वर्ष बाद सदन में जैसा व्यवहार नज़र आता है उससे किसी को गर्व की अनुभूति नहीं होती।

 

 

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आर्थिक बुनियाद को कमजोर करता राज्य का बजट : राजेंद्र बोड़ा https://vinayexpress.in/2022/03/02/editorial-by-rajendra-bora/ Wed, 02 Mar 2022 07:50:36 +0000 https://vinayexpress.in/?p=24346 विनय एक्सप्रेस, समाचार, जयपुर। प्रदेश के प्रतिष्ठित वरिष्ठ पत्रकार एवं विश्लेषक श्री राजेंद्र बोड़ा ने गेस्ट एडिटर के रूप मे विनय एक्सप्रेस के सुधि पाठकों के लिए राजस्थान सरकार कि बजट की फ़िलॉसफ़ी अपना आलेख प्रस्तुत किया है इस आलेख मे श्री बोड़ा द्वारा विभिन्न बिंदुओं विमर्श किया गया है, और उधार लेकर खर्च करने की प्रवृत्ति का अर्थ व्यवस्था पर असर को टटोला गया है।

सबको खुश रखने का प्रयास करते हुए राज्य विधान सभा में प्रस्तुत किये गये घोषणाओं से भरपूर 2022-23 के बजट पर राजनीतिक पक्ष-विपक्ष में खड़े रहने वालों की आशानुरूप प्रतिक्रियाएं आ चुकी हैं। एक हफ्ते से अधिक के गुजर जाने के बाद जब उनका शोर शांत हो चला है तो अब यह वक़्त है जब राजनीति का चश्मा उतार कर इस बजट भाषण को गंभीरता से टटोला जाय। बजट भाषण कोरी घोषणाओं का पुलिंदा नहीं होता। उसे “आय व्यय का विवरण” कहा जाता है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखाकार अपनी हर ऑडिट रिपोर्ट में यह बात लिखते हैं कि “बजट की वार्षिक कवायद सार्वजनिक संसाधनों का कुशल उपयोग करने के लिए रोडमैप का विवरण देने का एक साधन” है। इसीलिये वित्त मंत्री सदन में सरकार की आमद और खर्च का पाई-पाई का हिसाब देता है कि वह किस प्रकार व कहां से आता है और किस प्रकार तथा कहां खर्च किया जाता है। संसदीय गणतंत्र में इसकी व्यवस्था संविधान में की हुई है ताकि “हम भारत के लोग” जान सकें कि हमारे प्रतिनिधि किस प्रकार शासन की व्यवस्था चला रहे हैं।
सबसे पहले बजट भाषण पर ध्यान स्वाभाविक रूप से उसे प्रस्तुत करने वाले की टोन अर्थात लहजे पर जाएगा। इसका संकेत मुख्य मंत्री अशोक गहलोत, जो वित्त विभाग के भी प्रभारी भी हैं, ने अपना अब तक का सर्वकालिक लंबा भाषण देते हुए शुरू में ही एक शेर पढ़ते हुए दे दिया जब उन्होंने हंसी-हंसी में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की तरफ मुखातिब होते हुए कहा कि वे इस बार उनकी भाषा बोलेंगे। और उन्होंने ऐसा ही किया। राजे एक बड़े पूर्व राज घराने से आती हैं तो उनकी भाषा और लहजे में लोकतांत्रिक परंपराओं को सम्मान देते हुए भी पुरानी राजसी ठसक आ ही जाती थी जब वे बजट भाषण पढ़ती थीं। वह ठसक बीच-बीच में शेर-ओ-शायरी की नहीं होती थी बल्कि एक राजा के दंभ की होती थी। उन्होंने यह माना हुआ था कि निर्वाचित प्रतिनिधि भी नई लोकतांत्रिक व्यवस्था में “राजा” ही होता है। इसलिए उनके बजट भाषणों में “मैं” शब्द का प्रयोग बहुतायत से होतब था। उन्हीं की राह पर चलते हुए गहलोत भी अपने बजट भाषण में दर्जनों बार कह गए “मैं घोषणा करता हूं”। बजट किसी व्यक्ति का नहीं होता जिसे कोई कह सके कि मैं यह दे रहा हूं। सदन को यदि लोकतंत्र का मंदिर मानें तो वहां “मैं” कोई नहीं होता। सब हम होते हैं। मुख्यमंत्री भी हमारी सुंदर संवैधानिक व्यवस्था में “मैं” नहीं होता वह मंत्रिमंडल में “वन अमंग इक्वल” (समानों में एक) होता है। हमारी संवैधानिक शासन व्यवस्था में सामूहिक दायित्व का प्रावधान है। इसलिये इस बजट भाषण में सबसे पहले हमारा ध्यान उनके “मैं” का दंभ खींचता है। लोकतंत्र में उभर रही ये प्रवत्तियां पुराने ठकुराहट वाले सामंती युग की याद दिलाती है जिसे इतिहास कूड़ेदान में फेंक चुका है। जब कुछ दिया जाता है तो उसमें अंतर्निहित बात यह होती है कि कोई अपने पास से दे रहा है। उसमें से दे रहा है जो उसकी अपनी है। हमारी संवैधानिक संसदीय व्यवस्था में शासन निर्वाचित प्रतिनिधियों के जरिये जनता का होता है न कि किसी मुख्यमंत्री या पार्टी का। हमारे संविधान में सार्वभौम सत्ता या राज किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के पास नहीं है और न राष्ट्रपति के पास है। वह है भारत के नागरिकों के पास। इसलिए शासन का खजाना राजकोष कहलाता है। अंग्रेजी में इसे “पब्लिक एक्सचेकर” कहते हैं। राजकोष बनता है नागरिकों से प्राप्त होने वाले राजस्व तथा अन्य आय से। शासन का काम नागरिकों से राजस्व प्राप्त कर जनता की सुविधाओं पर यथोचित तरीके से खर्च करना होता है। इसिलिये अर्थशास्त्री बजट का विश्लेषण और उसकी समीक्षा उसमें अंतर्निहित प्रवत्तियों को टटोलते हुए करते हैं। लोकहितकारी शासन के बजट का दर्शन इस बात से आंका जाएगा कि वह जनता के पैसे का किस प्रकार किफायत से उपयोग करता है और आय तथा व्यय का किस प्रकार प्रबंधन करता है जिससे सबका सहज विकास संभव हो। यह बजट भाषण यह दर्शाता है कि बावजूद भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) की बार बार की चेतावनियों के राज्य सरकार को अपने राजस्व घाटे की कोई चिंता नहीं है और वह ‘ऋणम् कृत्वा घृतम पीवेत’ को अपना मंत्र मां कर उधार लेकर काम चला रही है। बजट के आंकड़े खुद अपनी कहानी कहते हैं। अगले वर्ष के बजट में 23 हजार 488 करोड़ 56 लाख रुपये का राजस्व घाटा बताया गया है और पूंजी खाते या कहें उधारी खाते में लगभग इतना ही 23 हजार 607 करोड़ 95 लाख रुपये का आधिक्य बताया गया है। अर्थात सरकार अपनी आमद से जो ज्यादा खर्च कर रही है वह उधार ले कर कर रही है। सच्चाई तो यह भी है कि जितने घाटे का बजट अनुमान लगाया जाता है वह साल पूरा होते बढ़ जाता है। पिछले साल का ही देंखें। इन्हीं मुख्यमंत्री ने पिछले साल बजट प्रस्तुत करते हुए 23 हजार 750 करोड़ 4 लाख रूपयों के राजस्व घाटे का अनुमान लगाया था। इस बजट में जब पिछला हिसाब दिया तो पता चला कि वास्तव में वह घाटा बढ़ कर 35 हजार 689 करोड़ 36 लाख रुपये पंहुच गया है। इसके बाद भी अपने बजट भाषण में उन्होंने राज्य सरकार के वित्तीय प्रबंधन की तारीफ की। राज्य का वित्तीय प्रबंधन और बजट तब गड़बड़ाते हैं जब राजनेता राज्य की आर्थिक बुनियाद मजबूत करके लोगों को स्थाई राहत देने की बजाय उसे चुनावी राजनीति का औजार बना लेते हैं। पिछले लंबे समय से ऐसा चल रहा है।
पहला जेंडर बजट (2012-13) और पहला पेपरलैस बजट (2021-22) पेश करने के लिए अपनी ही पीठ थपथपाते हुए मुख्यमंत्री ने इस बार पहले “कृषि बजट” के नाम पर जो पेश किया वह मूल बजट में कृषि वाले पैरे को अलग से पढ़ने के अलावा कुछ नहीं था। पहले किसी विषय पर किसी वित्तीय वर्ष में अधिक ध्यान देना होता तो वह बजट उस विषय को समर्पित करके किया जाता था जैसे स्वास्थ्य को समर्पित बजट या शिक्षा को समर्पित बजट। मगर इस बार दिल्ली के आसपास चली किसानी राजनीति के चलते कृषकों की सहानुभूति पाने के लिए समर्पित बजट को अलग से कृषि बजट के नाम का मुलम्मा चढ़ा दिया गया। जादूगरी यही की गई है कि कृषि वाला पैरा अलग से कृषि बजट का नाम देकर पढ़ दिया गया है। कृषि अर्थशास्त्रियों को बड़ी बेताबी से इंतज़ार था इस कृषि बजट का। वे समझना चाहते थे कि कृषि और किसानों की बातें करने वाले नीति निर्माता किस प्रकार कृषि को राज्य की समूची अर्थव्यवस्था में देखते हैं और ऐसा क्या करते हैं जिससे कृषि पर आश्रित आबादी की तकदीर सुधर सके। कृषि का अलग बजट उसी तर्ज पर होता जिस प्रकार पहले रेल्वे बजट होता था जो मूल बजट से एक दिन पहले अलग से संसद में प्रस्तुत होता था तो जरूर कहा जा सकता था कि राज्य सरकार कृषि का अलग बजट लेकर आई है।

इस बजट में एक ऐसी घोषणा की गई है जो अन्य सभी घोषणाओं पर भारी है। शासनरूढ़ दल को यह लगने लगा है कि जैसे कोई अलादीन का चिराग घिस दिया गया है जबकि यह घोषणा कार्यपालिका के उस तंत्र को साधने के लिए की गई है जो पहले ही बड़े दुलार से रखा जाता है। यह घोषणा है पुरानी पेंशन योजना को पिछली तारीख से फिर लागू करना। यह घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री बड़ी सलोनी अदा से कहने की चेष्टा की कि जैसे उन्हें मालूम ही नहीं कि किन परिस्थितियों में एक लंबे विमर्श के बाद एक जनवरी 2004 से नई पेंशन योजना क्यों लागू हुई। शायद किसी को याद नहीं कि एक समय ऐसा भी आया था कि किसी कर्मचारी के रिटायर होने पर मिलने वाले परिलाभ देने के भी सरकार के पास पैसे नहीं होते थे और उन्हें सरकारी बॉन्ड दे कर भुगतान टाला जाता था। मुख्यमंत्री बजट भाषण में कहते हैं “पेंशन के लगातार बढ़ते वित्तीय भार को कम करने की दृष्टि से ऐसा कदम उठाया गया होगा”। पुरानी पेंशन व्यवस्था फिर लाते हुए उन्होंने जहा कि “नवीन पेंशन स्कीम के कारण अभी से ही कार्मिकों में सेवानिवृत्ति के उपरांत वृद्धावस्था में जीवन यापन के लिए भारी असुरक्षा का भाव उत्पन्न हो गया है…सरकारी शासन से जुड़े कर्मचारी भविष्य के प्रति सुरक्षित महसूस करें, तभी वे सेवाकाल में सुशासन के लिए अपना अमूल्य योगदान दे सकते हैं”। यह भी कहा गया कि “सरकारी कर्मचारियों को रिटायर होने के बाद आत्मसम्मान से जीने के लिए ये बहुत ज़रूरी था”। तो क्या निजी क्षेत्र के कर्मचारियों या असंगठित मजदूरों को एक उम्र के बाद आत्मसम्मान से जीने का अधिकार नहीं है? वास्तव में तो वे बहुसंख्यक लोग हैं जिन्हें सहारा चाहिए। दूसरी तरफ सरकारी कर्मियों को नागरिकों के प्रति जवाबदेह बनाने से सरकार का लगातार कतराना भी जवाब मांगता है। इस सत्र में भी जवाबदेही कानून बनाने का विधेयक लाने में सरकार असफल रही है। वर्ष 2018 में राज्य विधान सभा चुनावों के लिए जारी अपने चुनाव घोषणापत्र में कांग्रेस ने यह वादा किया गया था कि उसकी सरकार बनती है तो जवाबदेही का कानून लाया जाएगा। इसे 10 जुलाई 2019 को परिवर्तित बजट प्रस्तुत करते हुए मुख्यमंत्री ने फिर दोहराया था कि लोकसेवकों की जवाबदेही के लिए ‘सार्वजनिक जवाबदेही कानून’ लाया जायेगा जो समस्त विभागों, प्राधिकरणों व निगमों पर लागू होगा। मगर अभी तो सरकारी कर्मियों को खुश रखना है। इस बजट के लिए सरकार अपने सीने पर कितने ही तमगे लगा ले, पर इस बजट में न्याय और समानता का कोई आर्थिक दर्शन नज़र नहीं आता।

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