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1 दांतों को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी है कि आप खाने के बाद ब्रश करें। लेकिन खाने के ठीक बाद ब्रश न करें, बल्कि कम से कम एक घंटे के बाद ही दांत साफ करें ताकि खाने के बाद बनने वाला चसुंनम आपके दांतों पर जमा ना हो सके।
2 सिर्फ सुबह के समय ही नहीं बल्कि रात को भी खाने के एक घंटे बाद या फिर सोते समय ब्रश करें, ताकि बैक्टीरिया मुंह व दांतों में जमे न रहें, अन्यथा रातभर मुह मे रहने वाले बैक्टीरिया दांतों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
3 ब्रश करते समय अगर आप जल्दबाजी में होते हैं और सिर्फ एक या दो राउंड ब्रश करके कुल्ला कर लेते हैं, तो यह तरीका गलत है। कम से कम 2 मिनट तक ब्रश करें और दांतों की जड़ों यानि मसूड़े की ओर से ऊपर की ओर ब्रश को चलाएं जिससे प्लाक साफ हो सके।
4 ब्रश करते समय दांतों पर अत्याधिक जोर न लगाएं, इससे उनकी जड़ें कमजोर हो सकती है और दांत में दर्द की समस्या भी हो सकती है। हल्के हाथों से ब्रश करें और नर्म ब्रिसल्स वाले ब्रश का उपयोग करें।
ब्रश को अधिकतम 2 महीने बाद बदल ले

5 दांतों पे कभी भी खट्टी और अम्लीय चीजे जैसे नींबु आदि का प्रयोग बिल्कुल ना करे, अम्ल दांतों के लिए अत्याधिक हानिकारक है, ये दांतों की बाहरी परत Enamel को पतला कर दाँत कमजोर बनाते हैं.
6. मसूड़ों की मजबूती के लिए गुनगुने पानी में नमक और मीठा सोडा डाल कर कुल्ला करने से मुह का Acid भी कम होता है और मसूड़ों मे मजबूती भी आती है
7. कभी भी पाउडर वाले लाल या काले दंत मंजन का ईस्तेमाल ना करे, ये दांतों के लिए खराब होता है, हमेशा झाग बनाने वाले Fluoride युक्त टूथ पेस्ट का ही ईस्तेमाल करे.

ड्रैगन फ्रूट हाइलोसेरस नाम के कैक्टस पर उगता है. यह देखने में पिंक बल्ब की तरह होता है. ड्रैगन फ्रूट पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थ है. इसके सेवन से कई फायदे हैं. यह एनर्जी से भरपूर खाद्य पदार्थ है. एक ड्रैगन फ्रूट में 102 कैलोरी ऊर्जा होती है. यह कार्बोहाइड्रेट का बहुत बड़ा स्रोत है. एक ड्रैगन फ्रूट में 22 ग्राम कार्बोहाइड्रैट होता है. इसके अलावा 13 ग्राम शुगर भी होता है. सबसे अच्छी बात यह है कि ड्रैगन फ्रूट में फैट नहीं होता है. इसलिए हार्ट के मरीजों के लिए ड्रैगन फ्रूट बहुत काम की चीज है. ड्रैगन फ्रूट के बीज भी बहुत गुणकारी है. ड्रैगन फ्रूट डाइजेस्टिव सिस्टम को सबसे ज्यादा स्ट्रॉन्ग बनाता है. इसके बीज में ओमेगा-3 और ओमेगा-9 फैटी एसिड पाया जाता है जो हार्ट की कोशिकाओं को मजबूत बनता है. आइए जानते हैं ड्रैगन फ्रूट के और कौन-कौन से फायदे हैं.

वेबएमडी की खबर के मुताबिक ड्रैगन फ्रूट में फ्लेवोनॉएड, फेनोलिक एसिड और बीटासायनिन जैसे एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं जो एजिंग के प्रभाव को कम करता है. यह फ्री रेडिक्लस से होने वाली कोशिकाओं की क्षति को रोकता है. फ्री रेडिकल्स के कारण प्रिमेच्योर एजिंग और कैंसर तक की बीमारी हो सकती है.
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ड्रैगन फ्रूट में प्रीबायोटिक गुण होता है. प्री-बायोटिक का मतलब होता है कि यह आंत में गुड बैक्टीरिया जिसे प्रोबायोटिक भी कहते हैं, को पोषण प्रदान करता है. यानी हेल्दी बैक्टीरिया के लिए ड्रैगन फ्रूट भोजन का काम करता है. अगर आंत में हेल्दी बैक्टीरिया की संख्या बहुत ज्यादा है तो डाइजेस्टिव सिस्टम बहुत बूस्ट रहता है. प्रीबायोटिक के कारण गुड बैक्टीरिया पनपते हैं जबकि बैड बैक्टीरिया का खात्मा होता है. गुड बैक्टीरिया अगर मजबूत हो तो पेट में बीमारी के लिए जिम्मेदार वायरस भी नहीं पनप पाते हैं.ब्लड शुगर को नियंत्रित करता है.

ड्रैगन फ्रूट ब्लड शुगर को लो करने में मददगार है. शोधकर्ताओं के मुताबिक ड्रैगन फ्रूट में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट पैनक्रियाज में क्षतिग्रस्त हो चुकी कोशिकाओं की मरम्मत करते हैं. पैनक्रियाज अगर सही सलामत हो तो इंसुलिन हार्मोन भई सही से बनता है. इंसुलिन ही खून में शुगर को तोड़कर एनर्जी में परिवर्तित करता है. अगर इंसुलिन कम बने तो शुगर की बीमारी हो जाती है.
इम्यूनिटी बूस्ट करता है
ड्रैगन फ्रूट में इम्यून सिस्टम को बूस्ट करने का गुण मौजूद है. क्योंकि इसमें पर्याप्त मात्रा में विटामिन-सी और कई तरह के एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं. सर्दी में ड्रैगन फ्रूट का सेवन विशेष लाभ देता है.

ड्रैगन फ्रूट में फैट बिल्कुल भी नहीं होता. इसलिए यह शरीर में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को नियंत्रित करता है. वजन कंट्रोल करने में ड्रैगन फ्रूट का सेवन लाभकारी है.
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जब हमारे शरीर पर कोई बैक्टिरिया या वायरस हमला करता है तो हमारा शरीर अपने आप ही उसे मारने की कोशिश करता है। इसी मकसद से शरीर जब अपना टेम्प्रेचर बढ़ाता है तो उसे ही बुखार कहा जाता है। जब भी शरीर का टेम्प्रेचर नॉर्मल (98.3) से बढ़ जाए तो वह बुखार माना जाएगा। आमतौर पर छोटे बच्चों को बुखार होने पर उनके हाथ-पांव तो ठंडे रहते हैं लेकिन माथा और पेट गर्म रहते हैं इसलिए उनके पेट से उनका बुखार चेक किया जाता है। क·ई बार बुखार 104-105 डिग्री फॉरनहाइट त·क भी पहुंच जाता है।

• डेंगू वाले मच्छर के किसी इंसान को काटने के बाद डेंगू का वायरस इंसान के ब्लड में 2-7 दिनों तक रहता है।
• डेंगू बुखार के लक्षण मच्छर के काटने के 4-7 दिनों में दिखते हैं। कभी-कभी इसमें 14 दिनों का वक्त भी लगता है।
• बुखार अक्सर तेज होता है और दिन में 4-5 बार आता है।
• डेंगू बुखार तकरीबन 7-10 दिनों तक बना रहता है और अपने आप ठीक हो जाता है। बुखार से प्रभावित कुल लोगों में से 10 फीसदी को ही हॉस्पिटल ले जाने की जरूरत होती है।

बुखार, तेज़ बदन दर्द, सिर दर्द खास तौर पर आंखों के पीछे, शरीर पर दाने आदि।
• डेंगू ऐसा भी हो सकता है कि इसके लक्षण न उभरें। ऐसे मरीज़ का टेस्ट करने पर डेंगू पॉजिटिव आता है लेकिन वह खुद-ब-खुद बिना किसी इलाज़ के ठीक हो जाता है।
• दूसरी तरह का डेंगू बीमारी के लक्षणों वाला होता है।
यह भी तीन किस्म का होता है: 1)क्लासिकल डेंगू फीवर,
2) डेंगू हेमरेजिक फीवर और
3)डेंगू शॉक सिंड्रोम।
1) क्लासिकल डेंगू फीवर एक नॉर्मल वायरल फीवर है। इसमें तेज बुखार, बदन दर्द, तेज सिर दर्द, शरीर पर दाने जैसे लक्षण दिखते हैं। यह डेंगू 5-7 दिन के सामान्य इलाज से ठीक हो जाता है।
2)डेंगू हेमरेजिक फीवर थोड़ा खतरनाक साबित हो सकता है। इसमें प्लेटलेट और W.B.C. की संख्या कम होने लगती है। नाक और मसूढ़ों से खून आना, शौच या उलटी में खून आना या स्किन पर गहरे नीले-काले रंग के चकत्ते जैसे लक्षण भी हो सकते हैं।
3)डेंगू शॉक सिंड्रोम में मरीज धीरे-धीरे होश खोने लगता है, उसका बीपी और नब्ज एकदम कम हो जाती है और तेज बुखार के बावजूद स्किन ठंडी लगती है।

• डेंगू के बचाव के लिए मच्छरों को पैदा होने से रोकना और काटने से रोकना, दोनों जरूरी हैं:
• कहीं भी खुले में पानी रुकने या जमा न होने दें। साफ पानी भी गंदे पानी जितना ही खतरनाक है। पानी पूरी तरह ढककर रखें। कूलर, बाथरूम, किचन आदि में जहां पानी रुका रहता है में दिन में एक बार मिट्टी का तेल डाल दें। ऐसा करने से उनमें मच्छरों के अंडे डिवेलप नही होंगे।
• एसी: अगर विंडो एसी के बाहर वाले हिस्से के नीचे पानी टपकने से रोकने के लिए ट्रे लगी हुई है तो उसे रोज खाली करना न भूलें। उसमें भी ब्लीचिंग पाउडर डाल कर रख सकते हैं।

• कूलर: इसका इस्तेमाल बंद कर दें। अगर नहीं कर सकते तो उसका पानी रोज बदलें और उसमें ब्लीचिंग पाउडर या बोरिक एसिड जरूर डालें।
• गमले: ये चाहे घर के भीतर हों या बाहर, इनमें पानी जमा न होने दें। गमलों के नीचे रखी ट्रे भी रोज खाली करना न भूलें।
• छत: छत पर टूटे-फूटे डिब्बे, टायर, बर्तन, बोतलें आदि न रखें या उलटा करके रखें। पानी की टंकी को अच्छी तरह बंद करके रखें। पक्षियों को दाना-पानी देने के बर्तन को रोज पूरी तरह से खाली करके साफ करने के बाद पानी भरें।
• किचन, बाथरूम: सिंक/वॉशबेसिन में भी पानी जमा न होने दें। हफ्ते में एक बार अच्छी तरह से सफाई करें। पानी स्टोर करने के बाद बर्तन पूरी तरह ढक कर रखें। बेहतर तो यह है कि गीले कपड़े से ऐसे बर्तनों को ढकें ताकि मच्छर को जगह न मिले। नहाने के बाद बाथरुम को वाइपर और पंखे की मदद से सुखा दें।
• ड्रॉइंगरूम: घर के अंदर सभी जगहों में हफ्ते में एक बार मच्छरनाशक दवाई का छिड़काव जरूर करें। डाइनिंग टेबल में सजाने के लिए रखे फूलों या फूलों के बर्तन में पानी रोज बदलें

• आउटडोर में पूरी बांह की शर्ट, बूट, मोजे और फुल पैंट पहनें। खासकर बच्चों के लिए इस बात का जरूर ध्यान रखें।
• तेज महक वाली परफ्यूम लगाने से बचें क्योंकि मच्छर किसी भी तरह की तेज महक की तरफ आकर्षित होते हैं।
• कमरे में मच्छर भगानेवाले स्प्रे, मैट्स, कॉइल्स आदि का प्रयोग करें। मस्किटो रेपलेंट को जलाते समय सावधानी बरतें। इन्हें जलाकर कमरे को 1-2 घंटे के लिए बंद कर दें। सोने से पहले खिड़की-दरवाजे खोल लें। खिड़की, दरवाजे बंद रखेंगे तो सांस की बीमारी हो सकती है।
• घर की मेन एंट्रेंस के बाहर लगी ट्यूब लाइट के पास मस्किटो रेपलेंट (गुडनाइट, ऑलआउट आदि) जलाकर रखें। इससे गेट खुलने पर अंदर आनेवाले मच्छरों को रोका जा सकेगा। आजकल इसे 24 घंटे जलाकर रखें ताकि मच्छर को जगह न मिले।
• सोने से पहले हाथ-पैर और शरीर के खुले हिस्सों पर विक्स लगाएं। इससे मच्छर पास नहीं आएंगे।
• मच्छरों को भगाने और मारने के लिए गुग्गुल जलाएं।
• लैवेंडर ऑयल की 15-20 बूंदें, 3-4 चम्मच वनीला एसेंस और चौथाई कप नीबू रस को मिलाकर एक बोतल में रखें। शरीर के खुले हिस्सों पर लगाने से पहले अच्छी तरह मिलाएं। इसे लगाने से मच्छर दूर रहते हैं।

• इम्युनिटी यानी बीमारियों से लड़ने की शरीर की क्षमता अच्छी हो तो कोई भी बीमारी आपको आसानी से दबोच नहीं पाती। इम्युनिटी बढ़ाने के लिए बैलेंस्ड डाइट लें। मौसमी फल, हरी सब्जियां, दाल, दूध-दही आदि खूब लें। हालांकि इम्युनिटी एक-दो दिन में नहीं बढ़ती। इसके लिए लंबे समय तक रुटीन का ध्यान रखना पड़ता है।
• खाने में हल्दी का इस्तेमाल करें। सुबह-शाम आधा-आधा छोटा चम्मच हल्दी पानी या दूध के साथ लें।
• तुलसी के 8-10 पत्ते शहद के साथ मिलाकर लें या तुलसी के 10 पत्तों को आधे गिलास पानी में उबालें। पानी आधा रह जाए तो उसे पी लें।
• विटामिन-सी से भरपूर चीजों जैसे आंवला, संतरा, मौसमी

कुछ लोग बिना कोई लक्षण दिखाए डेंगू वायरस से संक्रमित हो जाते हैं, शिशुओं और छोटे बच्चों में लक्षण अक्सर हल्के होते हैं।
शिशुओं और बच्चों में डेंगू आमतौर पर वायरल फ्लू से शुरू होता है जैसे लक्षण तेज बुखार, नाक बहना और खांसी
इसके अलावा, वे चिड़चिड़े और सामान्य से अधिक रोने वाले भी हो सकते हैं
अन्य लक्षणों में मसूड़ों या नाक से खून बहना, त्वचा पर लाल चकत्ते और उल्टी (दिन में तीन बार से अधिक) शामिल हैं।

तेज बुखार जो उतार-चढ़ाव करता है
आँखों के पीछे दर्द
मांसपेशियों और जोड़ों का दर्द
एक गंभीर सिरदर्द
किसी व्यक्ति को संक्रमित एडीज मच्छर के काटने के 8-10 दिनों के बाद ज्यादातर लक्षण दिखाई देते हैं, इस दौरान एक बच्चा दिखा सकता है: भूख में कमी

उलटी अथवा डेंगू बुखार बच्चों को कैसे प्रभावित करता है?
कुछ लोग बिना कोई लक्षण दिखाए डेंगू वायरस से संक्रमित हो जाते हैं, शिशुओं और छोटे बच्चों में लक्षण अक्सर हल्के होते हैं।
शिशुओं और बच्चों में डेंगू आमतौर पर वायरल फ्लू से शुरू होता है जैसे लक्षण तेज बुखार, नाक बहना और खांसी
इसके अलावा, वे चिड़चिड़े और सामान्य से अधिक रोने वाले भी हो सकते हैं
अन्य लक्षणों में मसूड़ों या नाक से खून बहना, त्वचा पर लाल चकत्ते और उल्टी (दिन में तीन बार से अधिक) शामिल हैं।

तेज बुखार जो उतार-चढ़ाव करता है
आँखों के पीछे दर्द
मांसपेशियों और जोड़ों का दर्द
एक गंभीर सिरदर्द
किसी व्यक्ति को संक्रमित एडीज मच्छर के काटने के 8-10 दिनों के बाद ज्यादातर लक्षण दिखाई देते हैं, इस दौरान एक बच्चा दिखा सकता है:
भूख में कमी
उलटी अथवा डेंगू बुखार बच्चों को कैसे प्रभावित करता है?
कुछ लोग बिना कोई लक्षण दिखाए डेंगू वायरस से संक्रमित हो जाते हैं, शिशुओं और छोटे बच्चों में लक्षण अक्सर हल्के होते हैं।
शिशुओं और बच्चों में डेंगू बुखार के लक्षण:
शिशुओं और बच्चों में डेंगू आमतौर पर वायरल फ्लू से शुरू होता है जैसे लक्षण तेज बुखार, नाक बहना और खांसी
इसके अलावा, वे चिड़चिड़े और सामान्य से अधिक रोने वाले भी हो सकते हैं
अन्य लक्षणों में मसूड़ों या नाक से खून बहना, त्वचा पर लाल चकत्ते और उल्टी (दिन में तीन बार से अधिक) शामिल हैं।
बड़े बच्चों में डेंगू बुखार के लक्षणों में शामिल हैं:
तेज बुखार जो उतार-चढ़ाव करता है
आँखों के पीछे दर्द
मांसपेशियों और जोड़ों का दर्द
एक गंभीर सिरदर्द
किसी व्यक्ति को संक्रमित एडीज मच्छर के काटने के 8-10 दिनों के बाद ज्यादातर लक्षण दिखाई देते हैं, इस दौरान एक बच्चा दिखा सकता है: भूख में कमी, उलटी अथवा जी मिचलाना ।



पेल्विक ऑर्गन प्रोलैप्स एक ऐसी समस्या हैं, जो आमतौर पर स्त्रीयों में नजर आती है, फिर भी इस समस्या से अधिकतर महिला वर्ग को इसे लेकर जानकारी का अभाव रहता है। जानकारों की माने तो, लगभग 10 प्रतिशत युवा महिलाओं को और 50 प्रतिशत मध्य आयु की महिलाओं को प्रोलैप्स से जूझना पड़ सकता है। पेल्विक ऑर्गन प्रोलेप्स क्या है तथा इस समस्या के चलते महिलाओं को किस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता हैं, इस बारे में बिन्नानी हॉस्पिटल एवं आईवीएफ सेण्टर बीकानेर की निदेशक एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ तथा आईवीएफ एक्सपर्ट ने विनय एक्सप्रेस वेबपोर्टल को विस्तार से जानकारी दी।
क्या हैं पेल्विक ऑर्गन प्रोलैप्स?
स्वाती बिन्नानी बताते हैं की इंटरनेशनल गायनेकोलॉजी एसोसिएशन के अनुसार पेल्विक ऑर्गन प्रोलैप्स, जो की चिकित्सा जगत में ’पीओपी’ नाम से प्रसिद्ध है, वह अवस्था है जब महिला के पेट के निचले हिस्से की मांसपेशियों में कमजोरी आने या अन्य कारणों से उसके पेल्विक अंग खिसक कर नीचे की तरफ आने लगते है। ऐसी अवस्था में महिला को महसूस होता है कि उसके पेल्विक यानी श्रोणि के अंग योनि की तरफ सरक रहें है। अलग-अलग महिलाओं में यह अवस्था अलग-अलग चरणों में आती है, जो कि उनके पेल्विक अंगों विशेषकर गर्भाशय की संरचना यानी एनाटॉमिकल स्थिति पर निर्भर करती है। दरअसल महिला के श्रोणि में गर्भाशय, मूत्राशय, मलाशय और योनी जैसे अंग आते हैं, ये सभी अंग श्रोणि की मांसपेशियों और स्नायुबंधन द्वारा अपनी-अपनी जगहों पर डटे रहते हैंद्य इन अंगों को श्रोणि के तल यानि निचली जमीन से भी काफी सहारा मिलता हैं, जिससे वे हिलते नहीं हैंद्य लेकिन किसी कारणवश यदि मांसपेशियां और स्नायुबंधन खिंच जाते हैं या फट जाते हैं, तब वे श्रोणि के अंगों को पहले जैसा सहारा नहीं दे पाते

पेल्विक ऑर्गन प्रोलैप्स के चरणों तथा उनके लक्षणों के बारे में जानकारी देते हुए डॉ. स्वाती बिन्नानी बताती हैं की ’पीओपी’ के प्रथम तथा दूसरे चरण में आमतौर पर महिलाओं को कुछ भी लक्षण नजर नहीं आते हैं तथा श्रोणि के अंगों में असहजता महसूस नहीं होती हैं। लेकिन ’पीओपी’ के तीसरे और चौथे चरण में जब तक कि श्रोणि के अंगों खासकर गर्भाशय का स्थान परिवर्तन होने जैसी स्थिति प्रारंभ होने लगती है, तो महिलाओं को दर्द तथा पेट के निचले हिस्से में असहजता महसूस होने लगती है। यह स्थिति महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डालती है, क्योंकि इस अवस्था में महिला को लगता है कि उसका गर्भाशय तथा श्रोणि के अन्य अंग शरीर से बाहर आ जाएंगे। जिससे कई बार महिलायें गंभीर तनाव का शिकार बन जाती हैं। हालांकि वास्तविकता में आमतौर पर यह समस्या ज्यादा गंभीर नहीं होती है, लेकिन पीड़ित का मानसिक स्वास्थ्य बना रहे इसके लिए जरूरी हैं की उसे विश्वास दिलाया जाए कि उनके शरीर का कोई भी अंग शरीर से बाहर नहीं आ सकता है।पेल्विक ऑर्गन प्रोलैप्स के कारणप्रोलैप्स यानी गर्भाशय तथा श्रोणि के अन्य अंगों का स्थान परिवर्तन करना एक अचानक से होने वाली परिस्थिति नहीं है।

महिलाओं में यह अवस्था उत्पन्न होने के कारण इस प्रकार हैं :
ऐसी महिलाएं जो कई बार गर्भवती हुई हो।जो लंबे समय से कब्ज की मरीज हो।मेनोपॉज के चलते शरीर में मांसपेशियों को मजबूत बनाने वाले एस्ट्रोजन हॉर्मोन यानी फीमेल हार्मोन की मात्रा की कमी।मोटापे के बढ़ने से शरीर भारी होता है, जिसके कारण पेट, श्रोणि के अंगों पर ज्यादा दबाव डालने लगता है।ऐसी महिलाएं, जो ऐसे व्यवसाय से जुड़ी हो जहां उन्हें नियमित तौर पर भारी सामान को उठाना या सरकाना पड़ता हो।ऐसी महिलाएं जिनकी छाती में किसी भी कारण से नियमित तौर पर दर्द रहता है।कनेक्टिव टिशु विकार या न्यूरोलॉजिकल या फिर बढ़ती उम्र।यह एक अनुवांशिक समस्या भी हो सकती है। परिवार में यदि किसी को पहले पीओपी की समस्या रही है, तो इस रोग को होने की आशंका बढ़ जाती है।
’पीओपी’ के लक्षण :- स्वाती बिन्नानी बताती हैं की प्रोलैप्स होने पर आमतौर पर महिलाओं को योनि में भारीपन या ऐसा महसूस होता है कि उनके योनि में सूजन है या कुछ भरा हुआ है।

प्रोलैप्स होने पर कुछ अन्य लक्षण जो पीड़ित को महसूस हो सकते है, इस प्रकार हैं;
पेट के निचले हिस्से और योनी पर किसी चीज का भारी दबाव महसूस होना।योनी से कुछ उभर कर बाहर निकलना।यौन संबंध के वक्त परेशानी होना।पूरी तरह से मूत्राशय को खाली ना कर पाना और बार-बार पेशाब आना।मूत्रविसर्जन या मलोत्सर्ग में दिक्कतें आना।हंसने पर, खांसने पर या छींकने पर हल्का सा पेशाब का निकल जाना।
उपचार :- ’पीओपी’ की समस्या गंभीर होने पर आमतौर पर महिला रोग विशेषज्ञ या यूरो गाइनेकोलॉजिस्ट महिलाओं को योनी के माध्यम से पेस्सरीज लगवाने की सलाह देती हैं। रबर या सिलिकॉन से बना हुआ यह उपकरण श्रोणि के अंगों को सहारा देता है और उन्हें जगह पर डटे रहने में मदद करता है।इसके अतिरिक्त महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन की मात्रा बढ़ाने के लिए गोलियां भी दी जाती हैं, जो कि उनकी योनि की दीवारों तथा मांसपेशियों को मजबूती प्रदान करती हैं। वहीं यदि अवस्था ज्यादा गंभीर हो, तो चिकित्सक सर्जरी के लिए भी सलाह देते हैं।
व्यवहार में परिवर्तनजीवन शैली में बदलावपेल्विक फ्लोर व्यायाम शौचालय का उपयोग करते समय बैठने की सही मुद्रा का ध्यान रखना ।ब्लैडर के स्वास्थ्य को बनाए रखना तथा बाउल हैबिट यानी नियमित रूप से और सही तरीके से मल त्यागने की आदत बनाए रखना।किसी भी सामान को उठाने की सही तकनीकों को उपयोग में लाना, जिससे पेट पर कम दबाव पड़े।जिंदगी की गुणवत्ता को बेहतर करने के लिए माइंडफुलनेस तकनीकों को उपयोग में लाना।
