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उन्होनें अभ्यर्थियों से अपील करते हुए कहा कि किसी भी प्रकार की असुविधा से बचने हेतु वे अपना फोटो पहचान पत्र, आवेदन की प्रति एवं फीस चालान की प्रति भी साथ ही रखें। साथ ही एक नवीनतम रंगीन फ़ोटो भी साथ लाना आवश्यक होगी। समन्वयक डाॅ. सिंह ने कहा कि परीक्षा के सुचारू रूप से संचालन हेतु सभी जिलों में जिला समन्वयक, जिला पर्यवेक्षक एवं केन्द्राधीक्षक को परीक्षा के सफल संचालन एवम कोविड-19 संबंधी दिशा निर्देशों की पालना सख्ती से करने के लिये आवश्यक दिशा निर्देश दिये गये हैं।
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रक्षा अनुसंधान संस्थान, हल्दवानी की निदेशक डाॅ. मधुबाला ने वेबिनार की उपादेयता पर प्रकाश डालते हुए सभी से कोरोना संबंधी सरकारी एडवायजरी की पालना की महती आवश्यकता पर बल दिया। विशिष्ट अतिथि सहायक निदेशक डाॅ. राकेश हर्ष ने अपने उद्बोधन में विकिरण के उपचार के साथ साथ औषधिय पादपों के उपयोग की आवश्यकता बताई।
संयोजक डाॅ. राजेन्द्र पुरोहित ने बताया कि इस वेबिनार में एम्स नई दिल्ली के डाॅ. डी.एन.शर्मा ने कम क्षमता के विकिरणों द्वारा कोविड-19 के उपचार के बारे में विस्तृता जानकारी प्रस्तुत की। डाॅ. शर्मा ने बताया कि एन्टीबायोटिक के विकास से पूर्व भी उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में विकिरणों द्वारा बीमारियों का इलाज किया जाता था। मायो केन्सर सेन्टर फ्लोरिडा, अमेरिका के डाॅ. सुनील कृष्णनन ने भी वर्तमान कोरोना काल में विकिरणों के उपचार की विभिन्न विधियों के बारे में बताया। एसएमएस अस्पताल, जयपुर के डाॅ. अरूण चोगले ने रेडियोथैरेपी के इतिहास का जिक्र करते हुए कहा यदि केन्सर का निदान समय पर हो जावे तो उसका उपचार सम्भव हो सकता है।
विभागाध्यक्ष डाॅ. मीरा श्रीवास्तव ने कहा कि 12 से 14 अक्टुबर 2020 को होने वाले विकिरण जैविकी पर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन को कोरोना की वजह से स्थगित कर दिया था। इसके कारण ही सोमवार 12 अक्टुबर को विकिरण जैविकी का सफलतम आयोजन किया गया है।
आयोजन सचिव डाॅ. अरूणा चक्रवर्ती ने बताया कि वेबिनार में शिक्षाविदों, वैज्ञानिको सहित लगभग 700 प्रतिभागियों ने सहभागिता की जो विशेष उल्लेखनीय है। डाॅ. चक्रवर्ती ने कहा कि वेबिनार में व्याख्यान देने वाले वैज्ञानिकों ने जो जानकारी प्रस्तुत की है वह विद्यार्थियों के लिये बेहद उपयोगी साबित होगी। उन्होनें डाॅ. नरेन्द्र भोजक, डाॅ. हेमेन्द्र भण्डारी एवं डाॅ.एस.के. वर्मा के योगदान की सराहना की। वेबिनार में डाॅ. रविन्द्र मंगल, डाॅ. जी.पी.सिंह, डाॅ. प्रताप सिंह सहित महाविद्यालय के बड़ी संख्या में संकाय सदस्यों एवं शोधार्थियों की भूमिका रही।