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चॉकलेट के डिब्बे को गोल गप्पे में बदलकर. अब हाल ऐसा है कि ग़ालिब का कोई शेर पसंद हो तो आप महफ़िल में इरशाद कर लो, ठीक है पर अगर आप उसी बहर में कोई नया शेर लिखना चाहते है तो आपको वो बहर, वो कलम न केवल ग़ालिब की पद प्रतिष्ठा के अनुरूप ही सजाना होगा बल्कि उस शेर कि लेगेसी, उसका बंद, ख्याल और रदीफ़ काफिया को साधना ही पड़ेगा. बदकिस्मती से लाल सिंह चड्ढा ये सब करने में चूक गई. ‘फॉरेस्ट गम्प’ के मोमेंट्स का भारतीयकरण होते-होते वो कैरिकैचर जैसे दीखने लगते है.

इसके अलावा फिल्म की सबसे बड़ी समस्या स्वयं आमिर खान है. फॉरेस्ट गंप का कैरेक्टर समझने और पकड़ने में उनसे भूल हुई. आमिर को लाल सिंह के बचपन का रोल निभाने वाले जूनियर एक्टर को देखना चाहिए था. उसका इनोसेंस, सपाट और सच्चाई भरा चेहरा गंप का असली कैरेक्टर था जिसे आमिर ने आर्टिफिसियल लैंग्वेज, बेवजह की हमिंग, खुली हैरान आँखों और एक्सप्रेशन से खराब किया. इस तरह के किरदार में आमिर का कम्फर्ट यही है. इसी कम्फर्ट में पीके और धूम के बाद अब लगातार तीसरी बार एक ही कैरेक्टर में आमिर को देखना बोझिल था. एक समस्या यह भी रही कि आमिर और करीना के अलावा किसी भी किरदार की गढ़त, भारतीय प्रसंगो में उसकी प्रासंगिकता, उसके विस्तार पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. चैतन्य नागा और मानव विज के किरदार ऑर्गेनिक रूप से डवलप ही न हो पाए.

डवलप नहीं हो पाया तो फिर उनके बीच की दोस्ती, उनके रिश्ते की बनावट नकली लगनी ही थी. मूल फिल्म के बब्बा के नाव और झींगो के व्यापार के सपने को चड्डी बनियान के सपने में बदलने का विचार तो बहुत ही बुरा था. फिल्म में मुख्य चार पांच कलाकारों के अलावा छोटे-मोटे करैक्टर की कोई स्थितियां तक न बन पाई. कॉलेज की रेस जैसे सीन में जब ऐसे छोटे किरदार आये तो फिल्म में प्रभाव आया भी. फिल्म में ऐसी बहुत बेसिक गलतियां हैं जो कि प्राय: आमिर खान की फिल्मों में देखने को नहीं मिलती हैं. आमिर बहुत मेहनत से, लगन से फिल्म बनाते हैं. इमोशन और मनोरंजन का सही मात्रा में तालमेल बिठाते हैं. फिल्म के हर पक्ष चाहे वो संगीत हो, निर्देशन हो, स्क्रिप्ट हो, कास्टिंग हो, उसमें अपनी जरूरी हस्तक्षेप और पकड़ रखते हैं. जब वो केवल दस-दस सेकिंड के शॉट के लिए भारत के तमाम राज्यों की रियल लोकेशन पर जा सकते हैं पर इस फिल्म में इन सब बातो पर कैसे ध्यान न दे पाए, समझ से परे है. वो आमिर खान हैं, उन्होंने पहले हमेशा ऐसा किया है इसलिए कोफ्त ज्यादा हो रही है.
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आप मूल फॉरेस्ट गंप फिल्म के मुरीद हो तो आपके लिए यह नुसरत की रूहानी कव्वाली अनु मलिक या हिमेश रेशमिया से सुनने जैसा है. किसी बढ़िया क्लासिक नॉवेल को गूगल ट्रांसलेट से पढ़ने जैसा.
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