संघ की ओर बढ़ते कदम : राजनीति में बदलती सोच

विनय एक्सप्रेस आलेख,  मनमोहन पुरोहित। संघ का शताब्दी वर्ष 2 अक्टूबर, विजया दशमी से प्रारंभ हो रहा है। यह मात्र औपचारिक आयोजन नहीं है, बल्कि देश के प्रत्येक गाँव और समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचने का एक संकल्प है। संघ के स्वयंसेवक अपनी निष्ठा, अनुशासन और संगठन क्षमता से इस संकल्प को साकार करने में लगे हुए हैं। यही कारण है कि आज जिन दलों ने हमेशा संघ का विरोध किया, उनके नेताओं में भी संघ की कार्यशैली और विचारधारा के प्रति सम्मान प्रकट करने का साहस दिखाई दे रहा है।

हाल ही का उदाहरण आगर-मालवा (मध्यप्रदेश) की सुसनेर सीट से कांग्रेस विधायक भैरोसिंह परिहार का है। एक सार्वजनिक मंच से उन्होंने स्वीकार किया कि वे कांग्रेसी होते हुए भी संघ से जुड़े हैं और अनेक पदाधिकारियों के साथ काम कर चुके हैं। यह स्वीकारोक्ति केवल एक व्यक्ति का वक्तव्य नहीं, बल्कि संघ की विचारधारा के बढ़ते प्रभाव का प्रमाण है।

कर्नाटक की राजनीति ने तो और भी आश्चर्यजनक मोड़ लिया। उप मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने विधानसभा में संघ की प्रार्थना गाकर सबको चौंका दिया। इसके बाद कांग्रेस विधायक एच.डी. रंगनाथ ने न केवल वही प्रार्थना गाई, बल्कि उसकी प्रशंसा करते हुए कहा कि “धरती को नमन करना जहां हम पैदा हुए, इसमें गलत क्या है?” यह वक्तव्य बताता है कि संघ की मूल भावना राजनीति की संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक गौरव पर आधारित है।

असल में, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल लंबे समय से वंशवाद के चंगुल में फंसे हुए हैं। इन दलों में कार्यकर्ता अपने नेतृत्व की विचारधारा से नहीं, बल्कि किसी एक परिवार के आदेशों से बंधे रहते हैं। यही कारण है कि ये दल समाज को जातियों और उपजातियों में बाँटकर राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास करते रहते हैं। मगर यह सच भी उतना ही स्पष्ट है कि समय के साथ जातीय राजनीति की धार कुंद हो रही है।

संघ इसके ठीक विपरीत समाज को जोड़ने का कार्य कर रहा है। राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखकर वह एक अभेद्य दीवार की तरह खड़ा है। यह दीवार उन ताकतों के खिलाफ है जो समाज में विभाजन और विघटन का वातावरण तैयार करती हैं। धीरे-धीरे विपक्षी दलों के नेताओं को भी यह समझ आ रहा है कि हिंदू समाज के हित में संघ से दूरी नहीं, बल्कि समीपता ही विकल्प है।

संघ की विचारधारा के प्रति विपक्षी नेताओं की बदलती सोच को राजनीति की नई शुरुआत माना जा सकता है। जब विरोधी खेमे के लोग भी संघ की प्रशंसा करने लगें, तो यह इस बात का संकेत है कि संगठन का प्रभाव न केवल सामाजिक स्तर पर, बल्कि राजनीतिक मानसिकता पर भी गहरा रहा है।

संघ की प्रशंसा करना अब केवल साहस का प्रश्न नहीं रहा, बल्कि हिंदू समाज के व्यापक हित में उठाया गया एक सकारात्मक कदम है। यह कदम उन नेताओं के लिए पहली सीढ़ी साबित हो सकता है, जो वंशवादी राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रवादी सोच की ओर बढ़ना चाहते हैं।

स्पष्ट है— शताब्दी वर्ष में संघ की गूंज गाँव-गाँव और मन-मन तक पहुँचेगी, और राजनीति का चरित्र भी इससे अछूता नहीं रहेगा।

लेखक मनमोहन पुरोहित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय बावड़ी कल्ला (फलौदी) में प्राचार्य पद पर आसीन हैं।