अक्षय तृतीया और उसकी उपयोगिता : पंडित पुरूषोत्तम ओझा

विनय एक्सप्रेस अध्यात्मिक आलेख. पंडित पुरूषोत्तम ओझा, बीकानेर जिले के एक सनातन धर्मावलंबी ज्योतिषी एवं पुराण-शास्त्र का अध्येता है। वर्षों से बीकानेर के मंदिरों, यज्ञ-हवनों तथा धर्म-प्रवचनों में भक्तों को हिंदू शास्त्रों की गहराई समझाते आ रहे है । आज इनके आलेख में आप ’’अक्षय तृतीया’’ के पावन पर्व तथा उसकी वास्तविक उपयोगिता के बारे में विस्तार पढ़िये। यह तिथि मात्र एक त्योहार नहीं, बल्कि ’’अक्षय पुण्य’’ का द्वार हैकृजिसमें किए गए शुभ कर्म कभी क्षय नहीं होते।

अक्षय तृतीया क्या है?

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कहा जाता है। “अक्षय” शब्द का अर्थ है—जो कभी नष्ट न हो, जो सदा बना रहे। पौराणिक ग्रंथों में वर्णित है कि इस दिन सूर्य और चंद्रमा दोनों अपनी उच्च राशि में होते हैं। इसलिए दोनों ग्रहों की संयुक्त कृपा से इस तिथि पर किया गया कोई भी शुभ कार्य अक्षय फल देता है।

यह तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्त या अबूझ मुहूर्त के नाम से भी प्रसिद्ध है। अर्थात् इस दिन पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती। बिना किसी शुभ मुहूर्त के भी विवाह, गृह-प्रवेश, भूमि-पूजन, नया व्यापार आरंभ, वाहन या आभूषण खरीदना पूर्णतः शुभ माना जाता है।

पौराणिक महत्व

शास्त्रों के अनुसार:

  • इसी तिथि को भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम जी का जन्म हुआ था। वे क्षत्रिय-कुल के अधर्म का नाश करने वाले थे। परशुराम जयंती के रूप में भी यह दिन मनाया जाता है।
  • महाभारत काल में सूर्य देव ने पांडवों को अक्षय पात्र दिया था, जिससे अन्न कभी समाप्त नहीं होता था।
  • इस दिन अन्नपूर्णा माता ने भगवान शिव को अक्षय भोजन प्रदान किया था।

इसलिए यह तिथि अन्न, धन, पुण्य और संतति की अक्षय वृद्धि का प्रतीक है।

उपयोगिता—इस दिन क्या करें?

अक्षय तृतीया की उपयोगिता केवल धार्मिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक, आर्थिक तथा आध्यात्मिक भी है। मैं अपने अनुभव से कुछ मुख्य उपयोगिताएँ बता रहा हूँ:

  1. नए कार्यों का शुभारंभ नया व्यापार, नई दुकान, नई कंपनी, घर-निर्माण या गृह-प्रवेश—सभी कार्य इस दिन बिना मुहूर्त देखे किए जा सकते हैं। फल अक्षय रहता है।
  2. धन-वृद्धि के लिए खरीदारी सोना, चाँदी, आभूषण, नया वस्त्र या कोई मूल्यवान वस्तु खरीदना विशेष शुभ है। मान्यता है कि इस दिन खरीदी गई वस्तुएँ जीवन भर समृद्धि लाती हैं।
  3. दान-पुण्य का अक्षय फल शास्त्र कहते हैं—इस दिन गौ-दान, भूमि-दान, स्वर्ण-पात्र दान, अन्न-दान, जल-पूर्ण घड़े, कुल्हड़, पंखा, छाता, सत्तू, ककड़ी, खरबूजा आदि ग्रीष्म-ऋतु की उपयोगी वस्तुओं का दान करने से पुण्य अक्षय होता है। पितरों को तर्पण या पिंडदान करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और उनकी कृपा सदैव बनी रहती है।
  4. आध्यात्मिक साधना ब्रह्म-मुहूर्त में उठकर गंगा-स्नान (या निकटवर्ती नदी/कुंड में स्नान), भगवान विष्णु या लक्ष्मी-नारायण की पूजा, जप-तप, हवन-स्वाध्याय करना चाहिए। नैवेद्य में सत्तू, ककड़ी, चने की दाल अर्पित करें। नए वस्त्र धारण करें और ब्राह्मण-भोजन करवाएँ।
  5. पाप-नाश और शुभ संकल्प इस दिन मन से क्षमा-प्रार्थना करें। दुर्गुणों को भगवान के चरणों में समर्पित कर सद्गुणों का वरदान माँगें। जो स्त्री-पुरुष संतान सुख चाहते हैं, वे भी इस दिन व्रत रखकर विशेष लाभ ले सकते हैं।

बीकानेर में परंपरा

बीकानेर जैसे राजस्थानी शहरों में अक्षय तृतीया को विशेष महत्व दिया जाता है। यहाँ के मंदिरों में भगवान परशुराम जी की पूजा, गौ-दान तथा सामूहिक सत्तू-भोग का आयोजन होता है। मैं स्वयं वर्षों से अपने भक्तों को सलाह देता आया हूँ कि इस दिन कम से कम एक ब्राह्मण को भोजन अवश्य कराएँ और जितना संभव हो दान करें।

अक्षय तृतीया केवल सोना खरीदने का दिन नहीं है—यह कर्म की अक्षयता का दिन है। जो इस दिन सच्चे मन से शुभ कार्य, दान और पूजा करता है, उसके जीवन में कभी अभाव नहीं रहता।
“यद् यद् कर्म कुरुते वैशाख-शुक्ल-तृतीयायाम्, तत् तत् अक्षयं भवति।”